अध्याय 1 |
| परिचय |
| 1 प्रभु यीशु के बारे में सच्ची और अद्भुत कहानी शुरू होती है। वे मसीह - सारी सृष्टि के राजा हैं। वे सृष्टि के परमेश्वर के बेटे हैं। |
| यशायाह की भविष्यवाणी |
| 2 एक आदमी था। वह प्रभु यीशु के जन्म से कई सौ साल पहले रहता था। उस आदमी का नाम यशायाह था। सृष्टि के परमेश्वर ने उससे कई बार बात की। प्रभु का संदेश लाने वाले यशायाह ने परमेश्वर के सारे वचनों को पवित्र किताब में लिखा। परमेश्वर ने यशायाह के द्वारा वादा किया, “मैं अपने बेटे से पहले अपना संदेश देने वाला भेजूँगा। मेरा संदेश देने वाला मेरे बेटे के आने के लिए रास्ता तैयार करेगा।” |
| 3 मेरे संदेश देने वाले की आवाज़ सुनो। वह रेगिस्तान में चिल्ला रहा है, “अरे लोगों, आने वाले प्रभु के लिए रास्ता तैयार करो! उनके लिए सीधे रास्ते बनाओ।” |
| यूहन्ना का संदेश |
| 4 इसलिए संदेश देने वाला आया, बिल्कुल जैसे यशायाह ने कई सौ साल पहले भविष्यवाणी की थी। उसका नाम यूहन्ना था। वह रेगिस्तान में रहता था। उसने प्रचार किया कि लोगों को सृष्टि के परमेश्वर से अपने पापों के लिए माफ़ी माँगनी चाहिए। उन्हें अपने पाप से जीने का तरीका छोड़कर नया जीवन शुरू करना चाहिए। उसके बाद लोगों को सृष्टि के परमेश्वर के नाम से पवित्र स्नान लेना चाहिए। |
| 5 यरूशलेम इस्राएल की राजधानी थी। यरूशलेम और सारे यहूदिया प्रदेश से लोग यूहन्ना का प्रचार सुनने के लिए गये। वहाँ लोगों ने अपने पापों से मुड़ने का फ़ैसला लिया। उसके बाद यूहन्ना ने लोगों को सृष्टि के परमेश्वर के नाम से पवित्र स्नान दिया। यह यरदन नदी में हुआ। |
| 6 यूहन्ना के कपड़े बहुत साधारण थे। वे ऊँट के बालों से बने हुए थे। उसकी कमर में चमड़े की बेल्ट थी। उसका खाना भी बहुत सादा था। वह टिड्डियाँ और जंगली शहद खाता था। |
| 7 यूहन्ना ने प्रचार किया, “मेरे बाद कोई आयेंगे जो मुझ से ज़्यादा शक्तिशाली हैं। वे मुझ से बहुत ज़्यादा महान हैं! मैं तो गुलाम की तरह नीचे बैठकर उनके चप्पल उतारने के लायक भी नहीं हूँ। |
| 8 मैं तो तुम्हें सृष्टि के परमेश्वर के नाम से पानी से पवित्र स्नान देता हूँ। लेकिन आने वाले प्रभु तुम्हें पवित्र आत्मा से पवित्र स्नान देंगे।” |
| प्रभु यीशु का यूहन्ना से मिलना |
| 9 गलील प्रदेश में नासरत शहर था। एक दिन प्रभु यीशु नासरत से यूहन्ना के पास आये। और यूहन्ना ने उन्हें सृष्टि के परमेश्वर के नाम से पवित्र स्नान दिया। यह यरदन नदी में हुआ। |
| 10 जब प्रभु यीशु पानी से बाहर आ रहे थे उन्होंने स्वर्गों को खुला हुआ देखा। और सृष्टि के परमेश्वर की पवित्र आत्मा कबूतर की तरह उनके ऊपर आयी। |
| 11 और स्वर्ग से परमेश्वर की आवाज़ आयी, “तुम मेरे प्यारे बेटे हो। मैं तुम से प्यार करता हूँ। और मैं तुम से पूरी तरह से खुश हूँ।” |
| 12 उसी समय सृष्टि के परमेश्वर की पवित्र आत्मा ने प्रभु यीशु को रेगिस्तान में भेज दिया। |
| 13 और प्रभु यीशु चालीस दिनों तक रेगिस्तान में रहे। शैतान ने कोशिश की कि प्रभु सृष्टि के परमेश्वर की बात न मानें। वहाँ जंगली जानवर भी थे। लेकिन परमेश्वर ने अपने बेटे की देखभाल के लिए अपने स्वर्गदूत भेजे। |
| प्रभु यीशु का पहले चेलों को चुनना |
| 14 उस समय हेरोदेस इस्राएल का राजा था। उसने यूहन्ना को पकड़वाकर जेल में डलवा दिया। उसके बाद प्रभु यीशु गलील गये। उन्होंने सृष्टि के परमेश्वर के राज्य के बारे में प्रचार किया। |
| 15 उन्होंने कहा, “समय आ गया है! परमेश्वर का राज्य नज़दीक है। अपने पाप से जीने का तरीका छोड़ दो! सृष्टि के परमेश्वर के साथ नया जीवन शुरू करो। विश्वास करो कि परमेश्वर तुम्हें माफ़ करते हैं और तुम्हारे पापों से तुम्हें आज़ादी देते हैं।” |
| 16 एक दिन प्रभु यीशु गलील समुद्र के किनारे गये। वहाँ उन्होंने शमौन और उसके भाई अन्द्रियास को देखा। वे समुद्र में जाल डाल रहे थे क्योंकि वे मछवारे थे। |
| 17 प्रभु यीशु ने कहा, “मेरे पीछे चलो। और मैं तुम्हें आदमियों का मछवारा बनाऊँगा।” |
| 18 उसी समय वे अपना जाल छोड़कर प्रभु के पीछे चले गये। |
| 19 उसके बाद प्रभु यीशु थोड़ा आगे गये। उन्होंने जब्दी के बेटों याकूब और उसके भाई यूहन्ना को देखा। वे नाव में अपने जाल ठीक कर रहे थे। |
| 20 उसी समय प्रभु ने उन्हें बुलाया। उन्होंने अपने पिता जब्दी को किराये के आदमियों के साथ नाव में ही छोड़ दिया। तब वे यीशु के पीछे चले गये। |
| प्रभु यीशु का बुरी आत्मा को निकालना |
| 21 प्रभु यीशु और उनके चेले कफरनहूम गये। उस शहर में सृष्टि के परमेश्वर का प्रार्थना घर था। शनिवार के दिन प्रभु प्रार्थना घर में गये। और वहाँ उन्होंने लोगों को शिक्षा दी। |
| 22 लोग उनकी शिक्षाओं से हैरान हो गये। उनके शब्दों में बड़ी शक्ति थी। उन्होंने परमेश्वर के कानून के दूसरे शिक्षकों की तरह शिक्षा नहीं दी। प्रभु यीशु ने पूरे अधिकार के साथ शिक्षा दी। |
| 23 प्रार्थना घर में एक आदमी था। वह पूरी तरह से बुरी आत्मा के वश में था। अचानक वह आदमी चिल्लाने लगा, |
| 24 “हमें अकेला छोड़ दे! नासरी शहर के यीशु, हमें क्यों परेशान कर रहा है? क्या तू हमें बरबाद करने आया है? मैं जानता हूँ कि तू कौन है! तू सृष्टि का पवित्र परमेश्वर है!” |
| 25 प्रभु यीशु ने बुरी आत्मा से ज़ोर से कहा, “चुप हो जा! इस आदमी से बाहर निकल जा!” |
| 26 बुरी आत्मा ने आदमी को बहुत ज़ोर से हिलाया। तब वह उस आदमी में से चीखते हुए बाहर निकला। |
| 27 सारे लोग बहुत हैरान हुए और डर गये। उन्होंने एक दूसरे से पूछा, “यह क्या है? इतनी शक्तिशाली नयी शिक्षा और इतने अधिकार के साथ! यहाँ तक कि यह आदमी बुरी आत्माओं को आज्ञा देता है और वे उनकी बात मानती हैं। |
| 28 जल्दी ही पूरे गलील प्रदेश में प्रभु यीशु के बारे में खबर फैल गयी। |
| प्रभु यीशु का बहुत से लोगों को ठीक करना |
| 29 प्रभु यीशु और उनके चेले सृष्टि के परमेश्वर के प्रार्थना घर से बाहर आये। फिर वे याकूब और यूहन्ना के साथ शमौन और अन्द्रियास के घर गये। |
| 30 शमौन की सास बिस्तर पर लेटी हुई थी। उसे बुखार था। उसी समय यीशु के चेलों ने उन्हें उसके बारे में बताया। |
| 31 इसलिए प्रभु उसके पास गये। उन्होंने उसका हाथ पकड़कर उसे बैठने में मदद की। अचानक से उसका बुखार उतर गया। फिर वह प्रभु यीशु और उनके चेलों की सेवा करने लगी। |
| 32 उस शाम को सूरज छिपने के बाद लोग उन सब को जो बीमार थे प्रभु के पास लेकर आये। वे उन सब को भी लाये जो बुरी आत्माओं के वश में थे। |
| 33 शहर के सारे लोग दरवाज़े पर इकट्ठे हो गये। |
| 34 लोगों को कई तरह की बीमारियाँ थीं। लेकिन प्रभु ने उनमें से बहुत सारे लोगों को ठीक किया। उन्होंने बहुत सी बुरी आत्माओं को भी लोगों में से निकलने की आज्ञा दी जो उनसे पीड़ित थे। बुरी आत्माएँ जानती थीं कि प्रभु यीशु सारी सृष्टि के राजा हैं। लेकिन उन्होंने बुरी आत्माओं को बोलने नहीं दिया। |
| प्रभु यीशु का शान्त जगह पर प्रार्थना करना |
| 35 अगली सुबह प्रभु यीशु बहुत जल्दी उठ गये। उस समय अँधेरा ही था। वे एक ऐसी जगह गये जहाँ वे पूरी तरह से अकेले रह सकते थे। और वहाँ उन्होंने प्रार्थना की। |
| 36 शमौन और यीशु के दूसरे चेले उन्हें ढूँढ़ने को निकल गये। |
| 37 जब उन्होंने प्रभु को पाया तब उन्होंने कहा, “हर कोई आपको ढूँढ़ रहा है!” |
| 38 लेकिन प्रभु ने जवाब दिया, “चलो, नज़दीक के गाँवों और शहरों में चलते हैं। मुझे वहाँ भी प्रचार करना है। मैं इसीलिए आया हूँ।” |
| 39 इसलिए प्रभु ने गलील प्रदेश की सभी जगहों की यात्रा की। उन्होंने सृष्टि के परमेश्वर के प्रार्थना घरों में प्रचार किया। उन्होंने बहुत से लोगों में से बुरी आत्माओं को भी निकाला। |
| प्रभु यीशु का एक कोढ़ी आदमी को ठीक करना |
| 40 एक आदमी को कोढ़ नामक भयानक त्वचा की बीमारी थी। नियम के अनुसार कोढ़ी आदमी स्वस्थ लोगों के साथ नहीं रह सकता था। इसलिए वह समाज से अलग दूसरे कोढ़ियों के साथ रहता था। वह आदमी प्रभु के पास आया और अपने घुटनों पर बैठकर उनसे विनती की, “अगर आप मुझे ठीक करना चाहें तो आप मुझे इस बीमारी से शुद्ध कर सकते हैं।” |
| 41 प्रभु यीशु दया से भर गये। तब उन्होंने अपना हाथ बढ़ाकर उस आदमी को छुआ। उन्होंने कहा, “मैं तुम्हें इस बीमारी से शुद्ध करना चाहता हूँ। ठीक हो जाओ!” |
| 42 यीशु के यह कहते ही उसका कोढ़ गायब हो गया। वह आदमी पूरी तरह से ठीक हो गया! |
| 43 तब प्रभु ने उसी समय उस आदमी को वहाँ से भेज दिया। उन्होंने उस आदमी को कड़ी चेतावनी दी, |
| 44 “ये बात किसी को मत बताना। लेकिन जाओ और खुद को सृष्टि के परमेश्वर के पुरोहित को दिखाओ। पुरोहित को तुम्हें जाँचने दो। फिर अपने ठीक होने के लिए बलिदान चढ़ाओ। उसे वैसे ही करो जैसे प्रभु का संदेश लाने वाले मूसा ने सृष्टि के परमेश्वर के कानून में आज्ञा दी थी। यह सबके लिए इस बात का सबूत होगा कि तुम अपनी बीमारी से सच में शुद्ध हो गये हो।” |
| 45 लेकिन वह आदमी गया और यह खबर फैलायी। वह सबसे कह रहा था कि प्रभु यीशु ने उसे ठीक किया। इसलिए प्रभु फिर उस शहर में खुलेआम नहीं जा पाये। उन्हें शहर से बाहर सुनसान जगह पर रुकना पड़ा। लेकिन हर जगह से लोग प्रभु यीशु के पास आये। |
अध्याय 2 |
| प्रभु यीशु का लकवे के बीमार को ठीक करना |
| 1 कई दिनों के बाद प्रभु यीशु कफरनहूम शहर में वापस आये। लोगों ने सुना कि वे अपने घर आ गये हैं। |
| 2 जल्दी ही उस घर में इतने सारे लोग जमा हो गये कि वहाँ कोई खाली जगह नहीं बची। यहाँ तक कि दरवाज़े के बाहर भी लोग खड़े थे। और प्रभु यीशु ने उनके सामने सृष्टि के परमेश्वर के वचन का प्रचार किया। |
| 3 चार आदमी एक लकवे के बीमार को लेकर आये। |
| 4 लेकिन भीड़ के कारण वे प्रभु यीशु के पास नहीं पहुँच सके। इसलिए उन्होंने उस घर की छत पर चढ़कर एक छेद बनाया। फिर उन्होंने लकवे के बीमार को उसकी चटाई पर प्रभु यीशु के ठीक सामने उतार दिया। |
| 5 प्रभु यीशु ने उनके विश्वास को देखकर लकवे के बीमार से कहा, “मेरे बेटे, मैं तुम्हारे पाप माफ़ करता हूँ।” |
| 6 लेकिन सृष्टि के परमेश्वर के कानून के कुछ शिक्षक वहाँ बैठे हुए थे। उन्होंने अपने दिल में सोचा, |
| 7 “ क्या? उसने सृष्टि के परमेश्वर के खिलाफ़ गलत शब्द कहे! सिर्फ़ सृष्टि के परमेश्वर को ही पाप माफ़ करने का अधिकार है!” |
| 8 उसी समय प्रभु यीशु अपनी आत्मा में जान गये कि वे लोग क्या सोच रहे थे। इसलिए प्रभु यीशु ने उनसे कहा, “तुम अपने दिल में ऐसी बातें क्यों सोच रहे हो?” |
| 9 क्या लकवे के बीमार से यह कहना आसान है, ‘मैं तुम्हारे पाप माफ़ करता हूँ’? या यह कहना, ‘खड़े हो जाओ, अपनी चटाई लो और चलो’? |
| 10 लेकिन मैं चाहता हूँ कि तुम यह जान लो कि मुझे, आदमी के बेटे को धरती पर पाप माफ़ करने का अधिकार है।” और उन्होंने लकवे के बीमार से कहा, |
| 11 “मैं तुम से कहता हूँ, खड़े हो जाओ, अपनी चटाई लो और घर जाओ।” |
| 12 उसी समय वह आदमी खड़ा हो गया। वह अपनी चटाई लेकर भीड़ के सामने से बाहर चला गया। सारे लोग हैरान रह गये। वे सृष्टि के परमेश्वर की बढ़ाई करने लगे। लोगों ने कहा, “हमने कभी ऐसा कुछ नहीं देखा!” |
| लेवी का बुलाया जाना |
| 13 तब प्रभु यीशु फिर से झील के किनारे चले गये। लोगों की भीड़ उनके चारों ओर इकट्ठी हो गयी और प्रभु ने उन्हें शिक्षा दी। |
| 14 जब प्रभु यीशु चल रहे थे तब उन्होंने हलफई के बेटे लेवी को देखा। लेवी टेक्स वसूल करने वाला था और अपने आँफ़िस में बैठा था। प्रभु ने उससे कहा, “मेरे पीछे चलो।” लेवी उठकर प्रभु यीशु के पीछे चला गया। |
| 15 प्रभु यीशु और उनके चेलों ने लेवी के घर पर खाना खाया। बहुत से टेक्स वसूल करने वाले और बुरे रुतबे के लोग भी उनके साथ खाना खा रहे थे। वहाँ उनकी तरह बहुत से ऐसे लोग थे जो प्रभु यीशु के पीछे चले। |
| 16 सृष्टि के परमेश्वर के कानून के शिक्षकों ने देखा कि प्रभु यीशु बुरे रुतबे के लोगों और टेक्स वसूल करने वालों के साथ खाना खा रहे थे। ये शिक्षक धार्मिक राजनीतिक पार्टी के सदस्य थे जो फरीसी कहलाते थे। वे ऐसे लोगों के साथ कभी नहीं खाते! इसलिए उन्होंने यीशु के चेलों से पूछा, “तुम्हारे गुरु ऐसे बुरे लोगों के साथ क्यों खाते हैं?” |
| 17 जब प्रभु यीशु ने यह सुना तब उन्होंने जवाब दिया, “अगर लोग सोचते हैं कि वे स्वस्थ हैं तो वे कभी डाँक्टर के पास नहीं जायेंगे। लेकिन अगर वे समझते हैं कि वे बीमार हैं तो वे डाँक्टर के पास ज़रूर जायेंगे। उसी तरह से, मैं उन्हें बुलाने आया हूँ जो समझते हैं कि वे पापी हैं ताकि वे पाप से जीने का तरीका छोड़ सकें। लेकिन अगर लोग सोचते हैं कि वे काफ़ी नेक हैं तो वे मेरी बात कभी नहीं सुनेंगे।” |
| लोगों का प्रभु से उपवास के बारे में पूछना |
| 18 यूहन्ना के चेले और फरीसी लगातार उपवास रखते थे। कुछ लोगों ने आकर प्रभु यीशु से पूछा, “यूहन्ना के चेले और फरीसी तो उपवास रखते हैं लेकिन आपके चेले उपवास क्यों नहीं रखते?” |
| 19 प्रभु ने जवाब दिया, “क्या शादी में दुल्हे के साथ खुशी मनाते समय मेहमान उपवास रखते हैं? बिल्कुल नहीं! जब वे दुल्हे के साथ हो तब वे उपवास नहीं रख सकते। |
| 20 लेकिन वह समय आयेगा जब दुल्हा उन्हें छोड़कर चला जायेगा। तब उन दिनों में वे उपवास रखेंगे। |
| 21 कोई भी पुराने कपड़े में नये कपड़े का टुकड़ा नहीं सिलता हैं। अगर वह ऐसा करे तो नये कपड़े का टुकड़ा पुराने कपड़े से खिचकर पहले से भी बड़ा छेद बना देगा। |
| 22 और कोई भी नयी वाइन चमड़े की पुरानी बोतल में नहीं डालता है क्योंकि वह गैस बनाना जारी रखेगी। और तब वह बोतल को फाड़ देगी क्योंकि बोतल खिच नहीं पायेगी। इसलिए नयी वाइन और पुरानी बोतल दोनों ही बरबाद हो जायेंगी। लोग नयी वाइन नयी बोतल में डालते हैं।” |
| प्रभु यीशु शनिवार के कानून से ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं |
| 23 एक दिन प्रभु यीशु और उनके चेले खेतों से होकर जा रहे थे। यह शनिवार का दिन था। यहूदी लोगों के लिए यह आराम और आराधना का खास दिन होता था। चलते समय यीशु के चेले अनाज की कुछ बालियाँ तोड़ने लगे। |
| 24 फरीसियों ने प्रभु यीशु से कहा, “आज शनिवार है। इस दिन काम करना मना है! फिर आपके चेले अनाज क्यों तोड़ रहे हैं?! वे सृष्टि के परमेश्वर के कानून को तोड़ते हैं।” |
| 25 लेकिन प्रभु यीशु ने जवाब दिया, “बेशक, तुम पवित्र किताब में पढ़ चुके हो कि राजा दाऊद ने क्या किया था! क्या तुमने नहीं पढ़ा? वह और उसके लोग भूखे थे। उन्हें मदद की ज़रूरत थी। |
| 26 यह तब हुआ जब अबियातार सृष्टि के परमेश्वर का महापुजारी था। राजा दाऊद परमेश्वर के घर में गया। वहाँ खास रोटियाँ थीं। पुरोहित परमेश्वर के सामने उसे भेट में लाये थे। जैसा कि तुम जानते हो कि नियम के अनुसार सिर्फ़ पुरोहितों को ही उन खास रोटियों को खाने का अधिकार है। लेकिन राजा दाऊद ने वे रोटियाँ खायीं और अपने लोगों को भी दीं।” |
| 27 तब प्रभु यीशु ने फरीसियों से कहा, “सृष्टि के परमेश्वर ने हमारे फ़ायदे के लिए शनिवार के बारे में यह कानून दिया। उन्होंने शनिवार आदमी के लिए बनाया न कि आदमी को शनिवार के लिए। |
| 28 मैं आदमी का बेटा हूँ। और मैं सब चीज़ों का प्रभु हूँ यहाँ तक कि शनिवार का भी!” |
अध्याय 3 |
| 1 फिर से प्रभु यीशु सृष्टी के परमेश्वर के प्रार्थना घर में गये। वहाँ पर एक आदमी था जिसका हाथ सिकुड़ा हुआ था। |
| 2 क्योंकि यह शनिवार का दिन था इसलिए प्रभु यीशु के दुश्मन उन्हें ध्यान से देख रहे थे। क्या वे शनिवार के दिन उस आदमी को ठीक करेंगे? उन्होंने योजना बनायी कि अगर प्रभु यीशु ने ऐसा किया तो वे उन पर दोष लगाएंगे। |
| 3 प्रभु ने उस सिकुड़े हुए हाथ वाले आदमी से कहा, “सबके सामने खड़े हो जाओ।” |
| 4 तब उन्होंने लोगों से पूछा, “सृष्टी के परमेश्वर का कानून हमें शनिवार को क्या करने की आज्ञा देता है? क्या हमें अच्छा काम करना चाहिए या बुरा? क्या हमें जीवन बचाना चाहिए या मार डालना चाहिए? लेकिन वे चुप रहे।” |
| 5 प्रभु यीशु ने चारों ओर नज़र घुमाकर उन्हें गुस्से से देखा। वे उनके ज़िद्दी दिलों के कारण बहुत दुखी थे। तब उन्होंने उस आदमी से कहा, “अपना हाथ फैलाओ।” उसने अपना हाथ फैलाया, और उसका हाथ ठीक हो गया, बिल्कुल दूसरे हाथ की तरह! |
| 6 उसी समय फरीसी चले गये और राजा हेरोदेस के लोगों से मिले। वे प्रभु यीशु को मारने की योजना बनाने लगे। |
| प्रभु यीशु के पीछे भीड़ का चलना |
| 7 प्रभु यीशु और उनके चेले झील की ओर गये। एक बड़ी भीड़ उनके पीछे चली। लोग सारे गलील, यहूदिया, |
| 8 यरूशलेम, इदूमिया, यरदन नदी के पूर्वी ओर से और सूर और सैदा के जितनी दूर से भी आये। लोग बड़ी संख्या में प्रभु यीशु के पास आये क्योंकि उन्होंने प्रभु यीशु के काम के बारे में सुना था। |
| 9 वहाँ इतनी भीड़ थी कि प्रभु ने अपने चेलों से अपने लिए एक नाव तैयार करने को कहा। |
| 10 प्रभु ने बहुतों को ठीक किया, इसलिए बीमार लोग उन्हें छूने के लिए आगे को धक्का दे रहे थे। |
| 11 जब उन लोगों ने जिनके अन्दर बुरी आत्माएँ थीं प्रभु यीशु को देखा तब वे उनके सामने गिर गये। आत्माएँ चिल्ला उठी, “तू सृष्टी के परमेश्वर का बेटा है!” |
| 12 लेकिन प्रभु ने उन्हें कड़ी चेतावनी दी कि वे किसी को यह न बतायें कि वे कौन थे। |
| प्रभु यीशु का बारह दूतों को चुनना |
| 13 तब प्रभु यीशु पहाड़ पर गये। उन्होंने उन चेलों को बुलाया जिन्हें वे बुलाना चाहते थे। और वे प्रभु के पास आये। |
| 14 प्रभु यीशु ने उनमें से बारह चेलों को चुना और उन्हें दूत कहकर बुलाया। ताकि वे प्रभु के साथ रहें और प्रभु उन्हें प्रचार करने के लिए भेज सकें। |
| 15 और उनके पास बीमारियों को ठीक करने और बुरी आत्माओं को निकालने का अधिकार हो। |
| 16 इसलिए प्रभु यीशु ने बारह दूतों को चुना। शमौन उनमें से एक था। प्रभु ने उसका नाम पतरस रखा। |
| 17 दूसरे जब्दी के बेटे, याकूब और यूहन्ना थे। प्रभु ने उनका नाम गरज के बेटे रखा। |
| 18 अन्द्रियास,फिलिप्पुस,बरतुल्मै,मत्ती,थोमा, हलफई का बेटा याकूब, तद्दै, शमौन कनानी भी वहाँ थे। |
| 19 और यहूदा इस्करियोति भी उनमें से एक था जिसने बाद में प्रभु यीशु को धोखा दिया। |
| कानून के शिक्षकों का यह कहना कि प्रभु यीशु में बुरी आत्मा है |
| 20 फिर प्रभु यीशु एक घर में आये। भीड़ फिर से जमा होने लगी। प्रभु और उनके चेले लोगों के साथ इतने बिज़ी थे कि उनके पास खाने के लिए भी समय नहीं था। |
| 21 यीशु के परिवार ने सुना कि क्या हो रहा था। इसलिए उन्होंने आकर प्रभु यीशु को ले जाने की कोशिश की क्योंकि कुछ लोगों ने कहा, “उनका दिमाग खराब हो गया है!” |
| 22 कुछ सृष्टी के परमेश्वर के कानून के शिक्षक यरूशलेम से आये। उन्होंने प्रभु के बारे में कहा, “वह शैतान के वश में है जो बुरी आत्माओं का राजा है! शैतान उसे बुरी आत्माओं को निकालने की शक्ति देता है !” |
| 23 इसलिए प्रभु यीशु ने उन्हें बुलाया। उन्होंने उनसे कहानियों का इस्तेमाल करके बात की, “शैतान कैसे शैतान को निकाल सकता है?” |
| 24 अगर एक राज्य अपने ही खिलाफ़ लड़े तो वह बरबाद हो जाएगा। |
| 25 अगर एक घर को उसी के खिलाफ़ बाँट दिया जाए तो वह टूट जाएगा। |
| 26 अगर शैतान अपने ही खिलाफ़ लड़े और बँट जाए तो वह खत्म हो जाएगा। वह उसका अन्त है। |
| 27 क्या कोई किसी शक्तिशाली आदमी के घर में ऐसे ही घुसकर उसे लूट लेता है? बिलकुल नहीं! पहले शक्तिशाली आदमी को बाँधना ज़रूरी है। तब चोर उसका घर लूट सकता है। |
| 28 सच यह है कि सृष्टी के परमेश्वर लोगों को उनके सारे पाप और यहाँ तक कि अपने खिलाफ़ सबसे भयानक श्राप भी माफ़ कर देंगे। |
| 29 लेकिन सृष्टी के परमेश्वर उस व्यक्ति को कभी माफ़ नहीं करेंगे जो पवित्र आत्मा के खिलाफ़ श्राप देता है। ऐसा व्यक्ति हमेशा के लिए दोषी ठहराया जाएगा। |
| 30 प्रभु यीशु ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि कानून के शिक्षकों ने कहा था कि उनके अन्दर बुरी आत्मा है। |
| यीशु की माँ और भाई |
| 31 यीशु की माँ और भाई उस घर में आये जहाँ प्रभु यीशु शिक्षा दे रहे थे। वे बाहर खड़े रहे और उन्होंने किसी को प्रभु यीशु को बुलाने के लिए अन्दर भेजा। |
| 32 प्रभु के चारों ओर भीड़ बैठी हुई थी। और किसी ने उनसे कहा, “आपकी माँ और भाई बाहर हैं। वे आपको ढूँढ़ रहे हैं।” |
| 33 प्रभु यीशु ने जवाब दिया, “मेरी माँ कौन हैं? मेरे भाई कौन हैं?” |
| 34 तब उन्होंने अपने चारों ओर बैठे हुए लोगों को देखकर कहा, “ये मेरी माँ और मेरे भाई हैं! |
| 35 कोई भी जो सृष्टी के परमेश्वर की इच्छानुसार काम करता है वह मेरा भाई, बहन और माँ है।” |
अध्याय 4 |
| एक किसान की कहानी |
| 1 प्रभु यीशु फिर से झील के किनारे शिक्षा देने लगे। भीड़ जो उनके चारों ओर इकट्ठा हुई थी वह बहुत बड़ी थी। इसलिए प्रभु नाव में चढ़कर बैठ गये। सारे लोग किनारे पर थे। |
| 2 और प्रभु ने कहानियों का इस्तेमाल करके उन्हें कई बातें सिखाई। उन्होंने अपनी शिक्षाओं में कहा, |
| 3 “सुनो! एक किसान कुछ बीज बोने गया। |
| 4 उसने बीजों को खेत में बिखेरा। कुछ बीज रास्ते में गिरे। और पक्षियों ने आकर उन्हें खा लिया। |
| 5 कुछ बीज पथरीली जगह पर गिरे। वहाँ ज़्यादा मिट्टी नहीं थी। पौधे बहुत जल्दी उग गये क्योंकि मिट्टी गहरी नहीं थी। |
| 6 लेकिन जब सूरज उगा तब उसने पौधों को जला दिया। वे सूख गये क्योंकि उनकी जड़े नहीं थीं। |
| 7 कुछ बीज काँटों में गिरे। पौधों के चारों ओर काँटे बड़े हो गये। इसलिए पौधों में फल नहीं आये। |
| 8 कुछ बीज अच्छी मिट्टी पर गिरे। वे बड़े होकर फ़सल लाये। उनमें से कुछ किसान के बीज से 30, कुछ 60 और यहाँ तक कि कुछ 100 गुना ज़्यादा फल लाये।” |
| 9 तब प्रभु यीशु ने कहा, “कोई भी जो सुनना चाहता है उसे सुनना और समझना चाहिए!” |
| 10 बाद में ज़्यादातर लोग उस जगह से चले गये जहाँ प्रभु यीशु थे। उनके बारह दूतों और चारों ओर के दूसरे लोगों ने प्रभु से कहानी के बारे में पूछा। |
| 11 उन्होंने जवाब दिया, “सृष्टि के परमेश्वर ने अपने राज्य के राज़ तुम्हारे लिए खोले हैं। लेकिन बाहर वालों के लिए मैं कहानी का इस्तेमाल करके बात करता हूँ। |
| 12 जैसे प्रभु का संदेश लाने वाले यशायाह ने कहा था, “वे देखेंगे लेकिन कभी नहीं जानेंगे कि वे क्या देख रहे हैं। वे सुनेंगे लेकिन कभी नहीं समझेंगे। इसलिए वे अपने पापों से नहीं मुड़ेंगे और सृष्टि के परमेश्वर उन्हें माफ़ नहीं करेंगे।” |
| 13 फिर प्रभु यीशु ने उनसे पूछा, “क्या तुम इस कहानी को नहीं समझते? फिर तुम दूसरी कहानियों को कैसे समझोगे?” |
| 14 किसान सृष्टि के परमेश्वर के वचन को बोता है। |
| 15 जो रास्ते में गिरे वे बीज क्या थे? जब लोग सन्देश सुनते हैं तब वचन बोया जाता है। लेकिन उसी समय शैतान आता है। वह उस वचन को ले जाता है जो उनके दिलों में बोया गया था। |
| 16 और जो पथरीली जगह पर गिरे वे बीज क्या थे? लोग सृष्टि के परमेश्वर का वचन सुनते हैं। और उसी समय वे उसे आनन्द के साथ स्वीकार करते हैं। |
| 17 लेकिन उनकी जड़ें नहीं होती हैं। इसलिए वे थोड़े समय के लिए ही विश्वास करते हैं। जब परमेश्वर के वचन की वजह से परेशानी या दुख आता है तब ऐसे लोग जल्दी ही विश्वास करना छोड़ देते हैं। |
| 18 और जो काँटों में गिरे वे बीज क्या थे? लोग सृष्टि के परमेश्वर का वचन सुनते हैं। |
| 19 लेकिन फिर उनके पास जीवन की परेशानियाँ आती हैं। धन अपने झूठे वादों के साथ आता है। और दूसरी चीज़ों के लिए इच्छाएँ आती हैं। ये सब चीज़ें ऐसे लोगों के अन्दर आती हैं। यह सृष्टि के परमेश्वर के वचन के विकास को रोक देती है। इसलिए उनके जीवन में कोई फल नहीं होता है। |
| 20 और जो अच्छी मिट्टी पर गिरे वे बीज क्या थे? लोग सृष्टि के परमेश्वर का वचन सुनकर उसे स्वीकार करते हैं। वे फ़सल पैदा करते हैं - किसान के बीज से कुछ 30, कुछ 60 और यहाँ तक कि कुछ 100 गुना ज़्यादा फल लाते हैं।” |
| दीपक की जगह |
| 21 फिर प्रभु यीशु ने उनसे पूछा, “क्या तुम दीपक अन्दर लाकर उसे कटोरे के नीचे या बिस्तर के नीचे रखते हो? बिल्कुल नहीं! तुम उसे किसी ऊँची जगह पर रखते हो। |
| 22 हर चीज़ जो अभी छिपी हुई या गुप्त में रखी हुई है अन्त में खोल दी जायेगी। |
| 23 कोई भी जो सुनना चाहता है उसे सुनना और समझना चाहिए!” |
| 24 फिर प्रभु यीशु ने कहा, “जो तुम सुनते हो उसके बारे में ध्यान से सोचो। जिस नाप से तुम देते हो उसी नाप से तुम्हें भी मिलेगा। वास्तव में, तुम जो ध्यान से सुनते हो तुम्हें और भी ज़्यादा मिलेगा। |
| 25 अगर तुम्हारे पास कुछ है तो तुम्हें और ज़्यादा मिलेगा। अगर तुम्हारे पास कुछ नहीं है तो तुम उसे भी खो दोगे जो तुम्हारे पास है।” |
| बढ़ते हुए बीज की कहानी |
| 26 फिर प्रभु यीशु ने कहा, “परमेश्वर का राज्य इस तरह का है। एक किसान खेत में बीज बोता है। |
| 27 बीज दिन-रात बढ़ते रहते हैं। यह होते रहता है चाहे किसान सो रहा हो या जाग रहा हो। वह नहीं जानता कि बीज कैसे बढ़ते हैं। |
| 28 धरती खुद ही फ़सल उगाती है। पहले पत्तियाँ आती हैं। फिर गेहूँ की बालियाँ बनती हैं। और आखिर में अनाज आता है। |
| 29 और जैसे ही अनाज पकता है किसान उसे काट देता है क्योंकि फ़सल तैयार हो जाती है।” |
| सरसों के बीज की कहानी |
| 30 फिर प्रभु यीशु ने कहा, “हम परमेश्वर के राज्य को किसकी तरह कह सकते हैं? हम उसे समझाने के लिए कौनसी कहानी का इस्तेमाल कर सकते हैं? |
| 31 यह सरसों के छोटे बीज की तरह है। यह धरती पर सबसे छोटे बीजों में से एक है। |
| 32 लेकिन जब इसे बोया जाता है तब यह सबसे बड़े पौधों में से एक बनता है। यह बढ़ा होकर अपनी शाखाओं को फैलाता है ताकि पक्षी इसकी छाया में आराम कर सकें।” |
| 33 प्रभु यीशु ने लोगों को सृष्टि के परमेश्वर के वचन की शिक्षा देने के लिए ऐसी कई कहानियों का इस्तेमाल किया। उन्होंने उतना ही प्रचार किया जितना कि लोग समझ सकते थे। |
| 34 उनहोंने लोगों को कहानी का इस्तेमाल किए बिना कुछ भी नहीं सिखाया। लेकिन जब प्रभु यीशु अपने चेलों के साथ अकेले थे तब उन्होंने सब कुछ समझाया। |
| प्रभु यीशु का तूफ़ान को शान्त करना |
| 35 जब शाम हुई तो प्रभु यीशु ने अपने चेलों से कहा, “चलो, झील के उस पार चलते हैं।” |
| 36 इसलिए वे भीड़ को पीछे छोड़कर प्रभु यीशु के साथ नाव में चले गये। लेकिन दूसरी नावों ने उनका पीछा किया। |
| 37 थोड़ी देर बाद बहुत बड़ा तूफ़ान शुरू हो गया। ऊँची लहरें नाव में आने लगीं। इसलिए वह पानी से लगभग भर गयी थी। |
| 38 प्रभु यीशु पीछे तकिये पर सो रहे थे। उनके चेलों ने उन्हें चिल्लाकर उठाया, “गुरु जी! हम डूब रहे हैं! क्या आपको कोई चिन्ता नहीं है?!” |
| 39 प्रभु ने उठकर हवा को रुकने की आज्ञा दी। उन्होंने लहरों से कहा, “शान्त हो जाओ! ठहर जाओ! अचानक हवा रुक गयी और वहाँ बहुत शान्ति थी।” |
| 40 उन्होंने अपने चेलों से पूछा, “तुम इतने डरे हुए क्यों हो? क्या तुम्हें अब भी विश्वास नहीं है?” |
| 41 चेले पूरी तरह से डर गये थे। उन्होंने एक दूसरे से पूछा, “ये आदमी कौन हैं? यहाँ तक कि हवा और लहरें भी उनकी बात मानती हैं!” |
अध्याय 5 |
| प्रभु यीशु का एक आदमी को बुरी आत्माओं के वश से छुड़ाना |
| 1 प्रभु यीशु और उनके दूत झील की दूसरी ओर गिरासेनियों के प्रदेश में पहुँचे। |
| 2 प्रभु नाव से उतरे। उसी समय एक आदमी कब्रस्तान से भागकर उनसे मिलने आया। वह आदमी पूरी तरह से बुरी आत्मा के वश में था। |
| 3 वह आदमी कब्रस्तान में रहता था। कोई भी उसे बाँध नहीं सकता था। ज़ंजीर भी उसे नहीं रोक सकती थी। |
| 4 लोगों ने कई बार उसके हाथ और पैर ज़ंजीर से बाँधे। लेकिन उसने ज़ंजीरों और पैर की बेड़ियों को तोड़कर टुकड़े-टुकड़े कर दिया। कोई भी इतना शक्तिशाली नहीं था कि उसे वश में कर सके। |
| 5 वह दिन-रात कब्रों के बीच और पहाड़ों पर चींखता-चिल्लाता रहता था। वह खुद को पत्थरों से काटता था। |
| 6 लेकिन जब उसने प्रभु यीशु को दूर से देखा तो वह उनके पास भागा। और वह प्रभु के सामने अपने घुटनों पर गिर गया। |
| 7 वह ज़ोर से चिल्लाया, “यीशु, सबसे ऊँचे परमेश्वर के बेटे, तू मुझ से क्या चाहता है? मैं तुझ से विनती करता हूँ, भगवान के लिए, मुझे मत सता!” |
| 8 बुरी आत्मा इस तरह इसलिए चिल्लायी क्योंकि प्रभु यीशु ने उससे पहले ही कह दिया था, “बुरी आत्मा, उस आदमी से बाहर निकल!” |
| 9 फिर प्रभु ने पूछा, “तेरा नाम क्या है?” बुरी आत्मा ने जवाब दिया,“मेरा नाम सेना है क्योंकि हम बहुत सारे हैं।” |
| 10 और बुरी आत्माओं ने प्रभु यीशु से बार–बार विनती की कि वे उन्हें उस इलाके से बाहर न भेजें। |
| 11 सूअर का एक बड़ा झुंड नज़दीक के पहाड़ी इलाके पर चर रहा था। |
| 12 बुरी आत्माओं ने प्रभु से विनती की, “हमें उन सूअरों में भेज दे। हमें उनमें जाने दे।” |
| 13 और प्रभु ने इसकी आज्ञा दे दी। बुरी आत्माएँ उस आदमी से निकलकर सूअरों में चली गयीं। उस झुंड में लगभग 2,000 सूअर थे। और पूरा झुंड झील की ओर एक गहरी ढलान पर से दौड़कर डूब गया। |
| 14 सूअरों के रखवाले भाग गये। उन्होंने शहर और गाँवों में लोगों को इस बारे में बताया। और हर कोई यह देखने के लिए गया कि क्या हुआ था। |
| 15 जल्दी ही प्रभु यीशु के चारों ओर भीड़ जमा हो गयी। उन्होंने उस आदमी को देखा जिसमें बहुत सी बुरी आत्माएँ थीं। वह वहाँ बैठा था। वह कपड़ों में और सही दिमागी हालत में था। इससे लोग डर गये। |
| 16 वे लोग जिन्होंने देखा कि क्या हुआ था उन्होंने हर किसी को उस आदमी और सूअरों के बारे में बताया। |
| 17 तब लोग प्रभु यीशु से उनकी जगह से चले जाने के लिए विनती करने लगे। |
| 18 इसलिए प्रभु वापस नाव में चले गये। जो आदमी अब बुरी आत्माओं से आज़ाद था उसने प्रभु के साथ जाने के लिए विनती की। |
| 19 प्रभु ने उसे अपने साथ नहीं जाने दिया लेकिन कहा, “अपने परिवार के पास अपने घर जाओ। उन्हें बताओ कि प्रभु ने तुम्हारे लिए कितना कुछ किया है और प्रभु ने कैसे तुम्हारे ऊपर दया की है।” |
| 20 इसलिए वह आदमी उस इलाके में चला गया जो दस शहर कहलाता था। वहाँ वह बताने लगा कि प्रभु यीशु ने उसके लिए कितना कुछ किया है। और सब लोग हैरान हो गए। |
| एक मरती हुई लड़की और एक पीड़ित औरत |
| 21 प्रभु यीशु वापस झील के पार दूसरे किनारे पर चले गये। वहाँ उनके चारों ओर बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गयी। |
| 22 फिर एक आदमी आया, उसका नाम याईर था। वह सृष्टि के परमेश्वर के प्रार्थना घर के मुखियाओं में से एक था। और जब उसने प्रभु यीशु को देखा तो वह उनके पैरों पर गिर गया। |
| 23 वह प्रभु के सामने गिड़गिड़ाया, “मेरी छोटी बेटी मर रही है। कृपया आकर उसे ठीक करने के लिए अपने हाथ उसके ऊपर रख दीजिए। तब वह जी पायेगी।” |
| 24 इसलिए प्रभु यीशु याईर के साथ गये। लोगों का बहुत बड़ा समुह उनके पीछे चला। वे प्रभु के चारों ओर जमा हो गये। |
| 25 भीड़ में एक औरत थी। उसे बारह साल से खून बहने की बीमारी थी। |
| 26 वह इलाज के लिए बहुत से डॉक्टरों के पास गयी और बहुत पीड़ित रही। उसने अपना सारा पैसा इलाज में खर्च कर दिया। लेकिन उसकी हालत ठीक होने के बजाय बिगड़ती जा रही थी। |
| 27 फिर उसने प्रभु यीशु के बारे में सुना। उसने भीड़ में उनके पीछे आकर उनके कपड़ों को छुआ। |
| 28 उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह कहती थी, “अगर मैं सिर्फ़ उनके कपड़ों को छू लूँ तो मैं ठीक हो जाऊँगी।” |
| 29 फ़ौरन खून बहना बन्द हो गया। और उसे महसूस हुआ कि वह ठीक हो गयी थी। |
| 30 उसी समय प्रभु यीशु को पता चला कि उनमें से शक्ति निकली थी। इसलिए उन्होंने भीड़ में चारों ओर घूमकर पूछा, “मेरे कपड़ों को किसने छुआ?” |
| 31 उनके चेलों ने उनसे कहा, “देखो, सारी भीड़ आपके चारों ओर धक्का दे रही है। आप कैसे पूछ सकते हैं, मुझे किसने छुआ?” |
| 32 लेकिन प्रभु यीशु चारों ओर देखते रहे। वे देखना चाहते थे कि उन्हें किसने छुआ। |
| 33 वह औरत डर से काँप रही थी। वह जानती थी कि उसके साथ क्या हुआ। इसलिए वह आकर प्रभु यीशु के पैरों पर गिर गयी। और उसने उन्हें सारी सच्चाई बता दी। |
| 34 प्रभु यीशु ने उससे कहा, “बेटी, तुम्हारे विश्वास ने तुम्हें बचाया है। शान्ति से जाओ और अपनी बीमारी से आज़ाद रहो।” |
| 35 जब प्रभु बात कर ही रहे थे, कुछ लोग याईर के घर से आये। उन्होंने कहा, “तुम्हारी बेटी मर गयी है। तुम अब भी गुरु को क्यों परेशान कर रहे हो?” |
| 36 लेकिन प्रभु ने उनके शब्दों पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने याईर से कहा, “डरो मत। सिर्फ़ विश्वास करो।” |
| 37 और उन्होंने पतरस, याकूब और याकूब के भाई यूहन्ना के अलावा किसी को भी अपने पीछे नहीं आने दिया। |
| 38 वे याईर के घर आये। वहाँ लोग मातम मना रहे थे। वे ज़ोर से रो रहे थे और शोक कर रहे थे। |
| 39 प्रभु यीशु अन्दर गये। तब प्रभु ने उन से कहा, “तुम लोग इतना मातम और शोक क्यों मना रहे हो? बच्ची मरी नहीं है। वह सिर्फ़ सो रही है।” |
| 40 लेकिन वे प्रभु पर हँसने लगे। इसलिए प्रभु ने उन सब को बाहर जाने को कहा। फिर वे लड़की के माता-पिता और अपने तीन चेलों को अन्दर उस कमरे में ले गये जहाँ वह लड़की लेटी हुई थी। |
| 41 प्रभु ने उसका हाथ पकड़ा। फिर उन्होंने उससे कहा, “छोटी लड़की, मैं तुम से कहता हूँ, उठ जाओ!” |
| 42 उसी समय वह लड़की, जो बारह साल की थी, उठ गयी। वह चारों ओर घूमने लगी। लोग बिल्कुल हैरान रह गये। |
| 43 प्रभु यीशु ने कड़ी आज्ञा दी कि जो कुछ हुआ उसे किसी को न बतायें। और प्रभु ने उनसे कहा कि लड़की को कुछ खाने को दें। |
अध्याय 6 |
| प्रभु का संदेश लाने वाले का असम्मान |
| 1 प्रभु यीशु देश के उस हिस्से से चले गये। वे अपने शहर, नासरत को लौटे। उनके चेले उनके साथ गये। |
| 2 जब शनिवार आया तो वे सृष्टि के परमेश्वर के प्रार्थना घर में शिक्षा देने लगे। बहुत लोग जिन्होंने उनकी बात सुनी वे हैरान हो गये। उन्होंने पूछा, “इस आदमी ने ये बातें कहाँ से सीखीं? इसे इतनी बुद्धि कहाँ से मिली? यहाँ तक कि वह ऐसे चमत्कार भी करता है! |
| 3 वह तो सिर्फ़ कार्पेन्टर है, मरियम का बेटा। और उसके भाई याकूब, योसेस, यहूदा और शमौन हैं। उसकी बहनें हमारे बीच में रहती हैं।” लोगों ने प्रभु को स्वीकार नहीं किया और उन पर विश्वास करने से मना कर दिया। |
| 4 तब प्रभु यीशु ने उन्हें बताया, “प्रभु का संदेश लाने वाले को अपने शहर के अलावा हर जगह सम्मान मिलता है। वह अपने रिश्तेदारों और अपने परिवार के बीच कोई सम्मान नहीं पाता है।” |
| 5 प्रभु ने कुछ बीमार लोगों पर हाथ रखकर उन्हें ठीक किया। लेकिन वे वहाँ पर और कोई चमत्कार नहीं कर सके। |
| 6 और उन्हें हैरानी हुई क्योंकि उनके शहर के लोगों में विश्वास नहीं था। फिर प्रभु यीशु लोगों को शिक्षा देते हुए गाँव-गाँव गये। |
| प्रभु यीशु का बारह दूतों को भेजना |
| 7 प्रभु यीशु ने बारह दूतों को अपने पास बुलाकर उन्हें दो-दो करके भेज दिया। प्रभु ने उन्हें बुरी आत्माओं को निकालने का अधिकार दिया। |
| 8 प्रभु के आदेश ये थे, “अपनी यात्रा के लिए सिर्फ़ एक छड़ी लेना। अपने साथ खाना, झोला और पैसे मत लेना। |
| 9 चप्पल पहनना और दूसरे कपड़े मत लेना।” |
| 10 और प्रभु ने उनसे कहा, “अगर कोई तुम्हें अपने घर में ठरहने के लिए बुलाये तो उस शहर को छोड़ने तक तुम वहीं रहना। |
| 11 हो सकता है कि कुछ जगहों पर तुम्हारा स्वागत न हो या वे तुम्हें न सुने। इसलिए जब तुम उस जगह को छोड़ो तो अपने पैरों की धूल झाड़ लेना। वह वहाँ पर रहने वाले लोगों के खिलाफ़ एक गवाही होगी।” |
| 12 इसलिए बारह दूत चले गये। और उन्होंने प्रचार किया कि लोगों को सृष्टि के परमेश्वर से अपने पापों के लिए माफ़ी माँगनी चाहिए। उन्हें अपने पापों से जीने का तरीका छोड़कर नया जीवन शुरू करना चाहिए। |
| 13 उन्होंने बहुत सी बुरी आत्माओं को निकाला। उन्होंने बहुत से बीमार लोगों पर तेल मलकर उन्हें ठीक किया। |
| राजा हेरोदेस का यूहन्ना को मारना |
| 14 राजा हेरोदेस ने प्रभु यीशु के बारे में सुना क्योंकि उनका नाम प्रसिद्ध हो गया था। कुछ लोग कह रहे थे, “यह यूहन्ना ही हो सकता है जिसने सृष्टि के परमेश्वर के नाम से लोगों को पवित्र स्नान दिया था। वह फिर से जीवित हो गया है। इसीलिए उसके पास ऐसे चमत्कार करने की शक्ति है।” |
| 15 दूसरे लोगों ने प्रभु यीशु के बारे में कहा, “वह प्रभु का संदेश लाने वाला एलिय्याह है जो बहुत साल पहले रहता था।” लेकिन दूसरों ने कहा, “वह प्रभु का संदेश लाने वाला है। वह पुराने समय में प्रभु का संदेश लाने वालों की तरह एक है।” |
| 16 लेकिन जब हेरोदेस ने यह सुना तो उसने कहा, “मैंने यूहन्ना का सिर कटवाने की आज्ञा दी थी। और अब वह फिर से जीवित हो गया है!” |
| 17 वास्तव में, हेरोदेस ने ही यूहन्ना को गिरफ़्तार करने के लिए सिपाही भेजे थे। उन्होंने यूहन्ना को बाँधकर जेल में डाल दिया। हेरोदेस ने ऐसा हेरोदियास के कारण किया। वह हेरोदेस के भाई फिलिप्पुस की पत्नि थी। लेकिन अब हेरोदेस ने उससे शादी कर ली थी। |
| 18 यूहन्ना हेरोदेस से कहता रहा, “तुम्हारा अपने भाई की पत्नि से शादी करना परमेश्वर के कानून के खिलाफ़ है।” |
| 19 हेरोदियास युहन्ना से बहुत गुस्सा हुई। वह उसे मारना चाहती थी लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकी। |
| 20 हेरोदेस यूहन्ना से डरता था। वह जानता था कि यूहन्ना एक अच्छा और पवित्र आदमी है। इसलिए उसने यूहन्ना को सुरक्षित रखा। जब हेरोदेस ने उसकी बात सुनी तो वह परेशान हो गया। लेकिन फिर भी वह यूहन्ना की बातें सुनना पसन्द करता था। |
| 21 आखिर में हेरोदियास को मौका मिल ही गया। हेरोदेस ने अपने जन्म-दिन पर बड़ी दावत दी। उसने अपने बड़े अधिकारियों और सेनापतियों को बुलाया। उसने गलील प्रदेश के सबसे खास लोगों को भी बुलाया। |
| 22 फिर हेरोदियास की बेटी ने अन्दर आकर नाच दिखाया। उसने हेरोदेस और उसके मेहमानों को खुश कर दिया। राजा ने उस लड़की से कहा, “तुम जो चाहे माँगो, मैं तुम्हें दूँगा।” |
| 23 और उसने कसम खाकर कहा, “तुम मेरे राज्य के आधे हिस्से तक जो भी माँगो मैं तुम्हें दूँगा!” |
| 24 उसने जाकर अपनी माँ से पूछा, “मुझे क्या माँगना चाहिए?” उसकी माँ ने उससे कहा, “यूहन्ना का सिर माँगो!” |
| 25 लड़की ने जल्दी से राजा के पास आकर कहा, “मैं चाहती हूँ कि आप मुझे अभी एक बड़े थाल में यूहन्ना का सिर दें।” |
| 26 राजा बहुत दुखी हुआ। लेकिन वह अपने मेहमानों के सामने अपनी कसम नहीं तोड़ना चाहता था। |
| 27 उसी समय उसने एक सिपाही को यूहन्ना का सिर लाने के लिए भेजा। वह सिपाही जेल में गया और यूहन्ना का सिर काट दिया। |
| 28 फिर वह उसे एक बड़े थाल में लेकर वापस आया। उसने उसे लड़की को दिया। और लड़की ने उसे अपनी माँ को दिया। |
| 29 यूहन्ना के चेलों ने इसके बारे में सुना। इसलिए वे आकर उसका शव ले गये। फिर उन्होंने उसे एक कब्र में दफ़ना दिया। |
| प्रभु यीशु का पाँच हज़ार को खिलाना |
| 30 प्रभु यीशु के चारों ओर बारह दूत जमा हो गये। उन्होंने जो कुछ किया और सिखाया उसके बारे में प्रभु को बताया। |
| 31 तब प्रभु ने कहा, “कुछ समय भीड़ से दूर जाकर आराम करते हैं।” उन्होंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि वहाँ बहुत से लोग आ-जा रहे थे। प्रभु यीशु और उनके दूतों के पास खाने के लिए भी समय नहीं था। |
| 32 इसलिए वे नाव में एक शान्त जगह पर चले गये। |
| 33 लेकिन बहुत से लोगों ने उन्हें जाते हुए देखा। उन्होंने प्रभु और उनके दूतों को पहचान लिया। इसलिए लोग सारे शहरों से भागकर उनसे पहले वहाँ पहुँच गये। |
| 34 प्रभु यीशु ने नाव से उतरकर बहुत बड़ी भीड़ देखी। प्रभु ने उन पर तरस खाया क्योंकि वे बिना चरवाहे की भेड़ों की तरह थे। इसलिए प्रभु उन्हें बहुत सी बातें सिखाने लगे। |
| 35 शाम को यीशु के चेलों ने उनके पास आकर कहा, “यह एक सुनसान जगह है, और देर हो रही है। |
| 36 लोगों को भेज दीजिए। ताकि वे नज़दीक के खेतों और गाँवों में जाकर कुछ खाना खरीद सकें।” |
| 37 लेकिन प्रभु यीशु ने जवाब दिया, “तुम ही उन्हें कुछ खाने को दो।” उन्होंने प्रभु से कहा, “उसका खर्चा एक आदमी की आठ महीने की सेलरी के बराबर होगा! क्या हम जाकर इतना पैसा खाने में खर्च करें?!” |
| 38 प्रभु ने पूछा, “तुम्हारे पास कितना खाना है? जाओ और देखो।” जब उन्होंने देखा तो कहा, “पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ।” |
| 39 फिर प्रभु यीशु ने अपने दूतों से उनकी मदद करने के लिए कहा। उन्होंने सब लोगों को मैदान में हरी घास पर झुण्डों में बिठा दिया। |
| 40 इसलिए वे सौ-सौ और पचास-पचास लोगों के झुंड में बैठ गये। |
| 41 प्रभु ने पाँच रोटियों और दो मछलियों को लिया। उन्होंने ऊपर स्वर्ग की ओर देखकर सृष्टि के परमेश्वर को धन्यवाद दिया। उन्होंने रोटियों के टुकड़े-टुकड़े किए। फिर वे रोटियाँ और मछलियाँ अपने चेलों को देते रहे। और चेले उन्हें लोगों को दे रहे थे। |
| 42 उन सब ने जितना चाहा उतना खाया। |
| 43 उसके बाद यीशु के चेलों ने रोटियों के टुकड़ों और मछलियों की बारह टोकरियाँ उठायीं। |
| 44 कुल 5,000 आदमियों ने उन पाँच रोटियों और दो मछलियों से खाया। |
| प्रभु यीशु का पानी पर चलना |
| 45 इसके बाद फ़ौरन प्रभु यीशु ने अपने चेलों को नाव में चढ़ने की आज्ञा दी। उन्होंने चेलों को उनसे पहले झील के दूसरे किनारे पर बैतसैदा जाने को कहा। फिर उन्होंने भीड़ को भेज दिया। |
| 46 उसके बाद प्रभु ने एक पहाड़ी पर जाकर अकेले प्रार्थना की। |
| 47 जब शाम हुई तब नाव झील के बीच में थी। प्रभु यीशु ज़मीन पर अकेले थे। |
| 48 उन्होंने देखा कि उनके चेले बहुत बड़ी मुसीबत में थे क्योंकि वे हवा के खिलाफ़ लड़ रहे थे। सुबह के करीब तीन बजे प्रभु पानी पर चलते हुए उनके पास आये। वे उनके पास से गुज़रने वाले थे। |
| 49 अचानक उनके चेलों ने उन्हें पानी पर चलते हुए देखा। उन्होंने सोचा वह भूत है और वे डर के मारे चिल्लाने लगे। |
| 50 जब उन्होंने प्रभु को देखा तो वे सब डर गए। उसी समय प्रभु अपने चलों से बोले, “साहसी बनो। यह मैं हूँ। डरो मत!” |
| 51 फिर प्रभु नाव में चढ़े और हवा रुक गयी। उनके चेले पूरी तरह से हैरान हो गये। |
| 52 वे अभी तक रोटियों के बढ़ने के चमत्कार का मतलब नहीं समझ पाये थे। उनके दिल कठोर थे और उन्होंने विश्वास नहीं किया। |
| 53 वे झील की दूसरी ओर गन्नेसरत में पहुँचे। वहाँ उन्होंने नाव बाँधी। |
| 54 जैसे ही वे नाव से उतरे लोगों ने प्रभु यीशु को पहचान लिया। |
| 55 वे बीमार लोगों को प्रभु के पास लाने के लिए पूरे इलाके में भागे। उन्होंने जहाँ पर भी प्रभु यीशु के होने की खबर सुनी वे बीमार लोगों को चटाई पर वहीं ले आए। |
| 56 प्रभु छोटे-बड़े शहरों और गाँवों में गये। वे जहाँ भी गये लोग बीमार लोगों को सड़कों पर ले आये। बीमार लोगों ने प्रभु से विनती की कि प्रभु उन्हें अपने कपड़ों का किनारा छूने दें। और सारे लोग जिन्होंने उन्हें छुआ वे ठीक हो गये। |
अध्याय 7 |
| कौन सी चीज़ लोगों को “अशुद्ध” बनाती है? |
| 1 एक दिन सृष्टि के परमेश्वर के कानून के शिक्षक और कुछ फरीसी यरूशलेम से आये। वे प्रभु यीशु के चारों ओर इकट्ठे हो गये। |
| 2 उन्होंने प्रभु के कुछ चेलों को “अशुद्ध” हाथों से खाना खाते देखा। इसका मतलब यह है कि यीशु के चेलों ने सामान्य यहूदी परंपरा के अनुसार हाथ नहीं धोये थे। |
| 3 सारे यहूदी और फरीसी रिवाज के अनुसार हाथ धोने के बाद ही खाना खाते हैं। यह बुज़ुर्ग लोग सिखाते हैं। |
| 4 जब वे बाज़ार से आते हैं तो वे तब तक खाना नहीं खाते जब तक कि वे परंपरा के अनुसार शुद्ध न हो लें। और वे बहुत सी दूसरी परंपराओं को भी मानते हैं जैसे कप, हँड़ियाँ, बरतन और टेबल को पारंपरिक तरीके से धोना। |
| 5 इसलिए फरीसी और कानून के शिक्षकों ने प्रभु यीशु से पूछा, “आपके चेले बुज़ुर्गों की परंपरा के अनुसार क्यों नहीं रहते? वे अपना खाना ‘अशुद्ध’ हाथों से क्यों खाते हैं?” |
| 6 प्रभु ने जवाब दिया, “प्रभु का संदेश लाने वाला यशायाह सही था। बहुत साल पहले सृष्टि के परमेश्वर ने उसके द्वारा तुम ढोंगियों के बारे में कहा था जो सिर्फ़ दिखाते हैं कि वे अच्छे हैं। परमेश्वर ने कहा, ‘ये लोग अपनी बातों से तो मेरा सम्मान करते हैं। लेकिन इनके दिल मुझ से बहुत दूर हैं। |
| 7 इनकी आराधना मेरे लिए कोई मायने नहीं रखती। वे आदमी के बनाये गये नियमों के अलावा और कुछ नहीं सिखाते हैं।’ |
| 8 इसलिए तुम सृष्टि के परमेश्वर के कानून से मुड़ गये हो। लेकिन तुम लोगों के नियमों को मानते हो।” |
| 9 प्रभु यीशु ने उनसे आगे कहा, “तुम परमेश्वर के कानूनों को कितनी चतुराई से अस्वीकार करते हो ताकि तुम अपनी खुद की परंपराओं को मानते रहो। |
| 10 उदाहरण के लिए सृष्टि के परमेश्वर ने तुम्हें प्रभु का संदेश लाने वाले मूसा के द्वारा यह कानून दिया: ‘अपने माता और पिता का आदर करो। कोई भी जो अपने माता या पिता के बारे में बुरा बोलता है उसे मार डाला जाये।’ |
| 11 लेकिन तुम लोगों को उनके माता-पिता से कहने देते हो, ‘माफ़ कीजिए, मैं आपकी मदद नहीं कर सकता। जो मैं तुम्हें दे सकता था उसे मैंने परमेश्वर को देने का वादा किया है।’ |
| 12 इस तरह से तुम उन्हें उनके ज़रूरतमन्द माता-पिता को अनदेखा करने देते हो। |
| 13 इसलिए तुम सृष्टि के परमेश्वर के वचन की जगह पर अपनी शिक्षाएं देते हो। तुम परमेश्वर के वचन को बेकार बनाते हो। और यह तो सिर्फ़ एक उदाहरण है। तुम ऐसे कई काम करते हो।” |
| 14 फिर से प्रभु यीशु ने भीड़ को अपने पास बुलाया। उन्होंने कहा, “सब लोग मेरी बात सुनो और इसे समझो। |
| 15 बाहर की कोई भी चीज़ मनुष्य के अन्दर जाकर उसे ‘अशुद्ध’ नहीं बना सकती। बल्कि जो मनुष्य से बाहर आता है वह उसे ‘अशुद्ध’ बनाता है। |
| 16 जो कोई सुनना चाहता है उसे सुनना और समझना चाहिए!” |
| 17 फिर प्रभु यीशु ने भीड़ को छोड़कर घर में प्रवेश किया। और उनके चेलों ने उनकी बात का मतलब पूछा। |
| 18 प्रभु ने कहा, “क्या तुम भी नहीं समझते? क्या तुम नहीं देखते? कुछ भी जो बाहर से आदमी के अन्दर जाता है उसे ‘अशुद्ध’ नहीं बना सकता। |
| 19 खाना उसके दिल में नहीं जाता। यह उसके पेट में जाता है। फिर शरीर से बाहर निकल जाता है।” ऐसा कहकर प्रभु ने दिखाया कि हर तरह का खाना खाया जा सकता है। |
| 20 और उन्होंने आगे कहा, “जो आदमी से बाहर आता है वह उसे ‘अशुद्ध’ बनाता है। |
| 21 लोगों के दिलों के अन्दर से बुरे विचार, अनैतिक सम्बन्ध, व्यभिचार और हत्या आते हैं। |
| 22 चोरी, लालच, बुरा करने की इच्छा, धोखा, हवस-भरी अभिलाषा की उत्सुकता, जलन, गाली, घमंड और मूर्खता भी लोगों के दिलों से ही आते हैं। |
| 23 ये सारी बुरी चीज़ें अन्दर से आती हैं और आदमी को ‘अशुद्ध’ बनाती है। |
| यूनानी औरत का विश्वास |
| 24 फिर प्रभु यीशु गलील से सूर के प्रदेश को चले गये। जब वे घर पहुँचे तो वे नहीं चाहते थे कि कोई जाने कि वे कहाँ हैं। लेकिन वे इसे राज़ नहीं रख सके। |
| 25 जल्दी ही एक औरत ने उनके बारे में सुना। उसकी छोटी बेटी एक बुरी आत्मा के वश में थी। वह औरत प्रभु यीशु के पास आकर उनके पैरों पर गिर गयी। |
| 26 उसने प्रभु से विनती की कि वे उसकी बेटी से बुरी आत्मा को निकाल दें। वह यहूदी नहीं थी लेकिन यूनानी थी जिसका जन्म सुरूफिनीकी में हुआ था। |
| 27 इसलिए प्रभु यीशु ने उससे कहा, “पहले मुझे यहूदियों की मदद करनी चाहिए। बच्चे जो खाना चाहते हैं उन्हें खाने दो। बच्चों की रोटियाँ लेकर कुत्तों के सामने डालना ठीक नहीं है।” |
| 28 उसने जवाब दिया, “हाँ प्रभु, लेकिन कुत्ते भी टेबल के नीचे से बच्चों के छोड़े हुए टुकड़ों को खाते हैं।” |
| 29 फिर प्रभु ने उससे कहा, “तुमने जो कहा उसके कारण बुरी आत्मा ने तुम्हारी बेटी को छोड़ दिया है। तुम अब जा सकती हो।” |
| 30 और जब वह घर पहुँची तो उसने अपनी बेटी को शान्ति से बिस्तर पर लेटा हुआ पाया। बुरी आत्मा जा चुकी थी। |
| प्रभु यीशु का एक आदमी को ठीक करना जो न सुन सकता था और न बोल सकता था |
| 31 फिर प्रभु यीशु सूर के प्रदेश से निकलकर सैदा से होते हुए गये। वे गलील के समुद्र और दस शहर के इलाके में आये। |
| 32 वहाँ कुछ लोग एक आदमी को उनके पास लाये। वह आदमी बहरा था और मुश्किल से बोलता था। उन्होंने प्रभु यीशु से विनती की कि प्रभु उस आदमी की चंगाई के लिए अपना हाथ उसके ऊपर रखें। |
| 33 प्रभु उस आदमी को भीड़ से दूर एक अलग जगह पर ले गये। उन्होंने अपनी उँगलियाँ उस आदमी के कान में डाली। फिर उन्होंने थूका और उस आदमी की जीभ को छुआ। |
| 34 प्रभु ने स्वर्ग की ओर देखा। उन्होंने गहरी साँस लेकर आज्ञा दी, “खुल जा!” |
| 35 उसी समय वह आदमी एकदम साफ़ सुनने लगा। उसकी जीभ खुल गयी और वह साफ़ बोलने लगा। |
| 36 प्रभु यीशु ने भीड़ को यह बात किसी को न बताने का आदेश दिया। लेकिन जितना ही उन्होंने मना किया लोगों ने उतनी ही ज़्यादा खबर फैलाई। |
| 37 हर कोई पूरी तरह से हैरान था। लोग प्रभु यीशु के बारे में बात करते रहे, “उन्होंने हर काम बहुत बढ़िया किया है! यहाँ तक कि वे बहरों को सुनने वाला और गूँगों को बोलने वाला बनाते हैं।” |
अध्याय 8 |
| प्रभु यीशु का चार हज़ार लोगों को खिलाना |
| 1 उन दिनों के दौरान दूसरी बड़ी भीड़ इकट्ठा हुई। उनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं था। इसलिए प्रभु यीशु ने अपने चेलों को बुलाकर कहा, |
| 2 “मुझे इन लोगों पर तरस आता है। ये मेरे साथ तीन दिन से हैं और इनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं है। |
| 3 अगर मैं उन्हें भूखा भेजता हूँ तो वे घर जाते हुए रास्ते में बहुत कमज़ोर हो जायेंगे। उनमें से कुछ बहुत दूर से आये हैं।” |
| 4 यीशु के चेलों ने जवाब दिया, “यह सुनसान जगह है। किसी को इतनी रोटियाँ कहाँ मिल सकती हैं कि उनके लिए काफ़ी हो?” |
| 5 फिर प्रभु ने पूछा, “तुम्हारे पास कितनी रोटियाँ हैं?” उन्होंने जवाब दिया, “सात।” |
| 6 प्रभु ने भीड़ को नीचे ज़मीन पर बैठने के लिए कहा। उन्होंने सात रोटियाँ ली और परमेश्वर को धन्यवाद दिया। फिर उन्होंने रोटियों के टुकड़े करके अपने चेलों को दिये। और चेलों ने रोटियाँ भीड़ में बाँट दीं। |
| 7 यीशु के चेलों के पास कुछ छोटी मछलियाँ भी थीं। प्रभु यीशु ने उन्हें भी आशीष दी। फिर उन्होंने अपने चेलों से मछलियाँ बाँटने को भी कहा। |
| 8 लोगों ने पेट भरकर खाया। उसके बाद यीशु के चेलों ने बचे हुए टुकड़ों के सात टोकरे उठाये। |
| 9 उस दिन भीड़ में लगभग 4,000 लोग थे। खाना खाने के बाद प्रभु यीशु ने उन्हें घर भेज दिया। |
| 10 ठीक उसके बाद प्रभु अपने चेलों के साथ नाव में चढ़ गये। वे दलमनूता इलाके में गये। |
| 11 फिर फरीसी आकर प्रभु से बहस करने लगे। वे उनकी परीक्षा लेना चाहते थे। इसलिए उन्होंने प्रभु से स्वर्ग से चमत्कार के चिन्ह दिखाने को कहा। |
| 12 प्रभु ने गहरी साँस लेकर कहा, “यह पीढ़ी चमत्कारी चिन्ह की माँग क्यों करते रहती है? सच यह है कि इस पीढ़ी को कोई चिन्ह नहीं दिया जायेगा।” |
| 13 इसलिए प्रभु उन्हें छोड़कर वापस नाव में चढ़ गये। वे झील के दूसरे किनारे पर चले गये। |
| फरीसियों और हेरोदेस का खमीर |
| 14 यीशु के चेले रोटियाँ लाना भूल गये थे। उनके पास नाव में सिर्फ़ एक ही रोटी थी। |
| 15 प्रभु यीशु ने उन्हें चेतावनी दी, “सावधान रहो। फरीसियों और हेरोदेस के खमीर से सावधान रहो।” |
| 16 यीशु के चेलों ने एक दूसरे से इस बारे में बात की, “वे ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि हमारे पास रोटियाँ नहीं हैं।” |
| 17 प्रभु यीशु जानते थे कि वे क्या कह रहे थे। इसलिए प्रभु ने उनसे पूछा, “तुम रोटियाँ न होने के बारे में क्यों बात कर रहे हो? क्या तुम अब भी नहीं समझते? क्या यह अब भी तुम्हारे लिए स्पष्ट नहीं है? क्या तुम्हारे दिल इतने कठोर हैं?” |
| 18 आँखें होते हुए भी क्या तुम नहीं देख सकते? कान होते हुए भी क्या तुम नहीं सुन सकते? और क्या तुम्हें कुछ भी याद नहीं? |
| 19 जब मैंने 5,000 लोगों के लिए पाँच रोटियाँ तोड़ी थीं तो तुमने बचे हुए टुकड़ों के कितने टोकरे उठाये थे?” यीशु के चेलों ने जवाब दिया, “बारह।” |
| 20 प्रभु यीशु ने आगे पूछा, “जब मैंने 4,000 लोगों के लिए सात रोटियाँ तोड़ी थीं तो तुमने बचे हुए टुकड़ों के कितने टोकरे उठाये थे?” उन्होंने जवाब दिया, “सात।” |
| 21 और प्रभु ने उनसे कहा, “क्या तुम अब भी नहीं समझ सकते?” |
| प्रभु यीशु का एक अन्धे आदमी को ठीक करना |
| 22 प्रभु यीशु और उनके चेले बैतसैदा आये। कुछ लोग एक अन्धे आदमी को लाये। उन्होंने प्रभु से उसे छूने के लिए विनती की। |
| 23 प्रभु यीशु अन्धे आदमी का हाथ पकड़कर उसे गाँव से बाहर ले गये। उन्होंने आदमी की आँखों पर थूका और अपने हाथ उसके ऊपर रखे। |
| 24 उस आदमी ने चारों ओर देखकर कहा, “मैं लोगों को देखता हूँ, लेकिन मैं उन्हें बहुत साफ़ नहीं देख सकता। वे चारों ओर घूमते हुए पेड़ों की तरह दिखाई देते हैं।” |
| 25 फिर से प्रभु यीशु ने उस आदमी की आँखों पर अपने हाथ रखे और उसे ध्यान से देखने की आज्ञा दी। और उसकी आँखें बिल्कुल ठीक हो गयीं। उसे सब कुछ साफ़ दिखाई दिया। |
| 26 प्रभु यीशु ने उसे घर भेजा और कहा, “गाँव में मत जाना और किसी को मत बताना।” |
| पतरस का प्रभु यीशु को मसीह कहना और प्रभु यीशु का अपनी आने वाली मौत के बारे में बताना |
| 27 प्रभु यीशु और उनके चेले कैसरिया फिलिप्पी के आस पास के गाँवों में गये। रास्ते में प्रभु ने उनसे पूछा, “लोग क्या कहते हैं कि मैं कौन हूँ?” |
| 28 उन्होंने जवाब दिया, “कुछ लोग कहते हैं कि आप यूहन्ना हैं जिसने लोगों को सृष्टि के परमेश्वर के नाम से पवित्र स्नान दिया। दूसरे लोग कहते हैं कि आप प्रभु का संदेश लाने वाले एलिय्याह हैं। लेकिन कुछ और लोग कहते हैं कि आप प्रभु का संदेश लाने वालों में से एक हैं।” |
| 29 फिर प्रभु ने पूछा, “तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ?” पतरस ने जवाब दिया, “आप मसीह हैं - सारी सृष्टि के राजा!” |
| 30 और प्रभु यीशु ने उन्हें चेतावनी दी कि वे उनके बारे में किसी को न बतायें। |
| 31 फिर प्रभु यीशु उन्हें शिक्षा देने लगे कि वे, आदमी के बेटे, बहुत भयानक दुख उठाएंगे। नेता, मुख्य पुरोहित और कानून के शिक्षक उन्हें ठुकरायेंगे। वे उन्हें मार डालेंगे। और तीन दिन के बाद वे फिर से जीवित हो जायेंगे। |
| 32 और प्रभु ने इस बारे में अपने चेलों से खुलकर बात की। लेकिन पतरस ने उन्हें अलग ले जाकर उनसे कहा कि उन्हें ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए। |
| 33 प्रभु यीशु ने मुड़कर अपने चेलों को देखा। फिर उन्होंने पतरस को डांटकर कहा, “शैतान, मेरे सामने से चला जा! पतरस, तुम परमेश्वर की चीज़ों के बारे में नहीं सोच रहे हो। तुम चीज़ों को सिर्फ़ मनुष्य के नज़रिये से देख रहे हो।” |
| 34 फिर प्रभु ने भीड़ और अपने चेलों को बुलाकर कहा, “अगर कोई मेरा चेला बनना चाहता है तो उसे खुद को त्यागना होगा। उसे अपनी स्वार्थी महत्वाकांक्षाओं को छोड़ना होगा। उसे अपना क्रूस उठाकर मेरे पीछे चलना होगा। |
| 35 जो कोई अपना जीवन अपने लिए रखना चाहता है वह उसे खोयेगा। लेकिन जो कोई अपना जीवन मेरे लिए या पापों से माफ़ी के बारे में मेरे संदेश के लिए त्याग देता है वह आदमी अपने जीवन को बचायेगा। |
| 36 अगर कोई सारी दुनियाँ को पाए लेकिन अपने प्राण को खो दे तो उस आदमी को क्या लाभ है? |
| 37 या आदमी अपने प्राण के बदले में क्या दे सकता है? |
| 38 इन व्यभिचारी और पापी लोगों में से ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचो जो मुझ से या मेरे संदेश से शर्मिन्दा है। मैं, आदमी का बेटा, जब पवित्र स्वर्गदूतों के साथ अपने पिता की महिमा में आऊँगा तब उस व्यक्ति से शर्मिन्दा हूँगा।" |
अध्याय 9 |
| 1 प्रभु यीशु ने कहा, “सच यह है कि तुम में से कुछ जो यहाँ पर खड़े हैं वे परमेश्वर के राज्य को शक्ति के साथ आते हुए देखने से पहले नहीं मरेंगे।” |
| प्रभु यीशु का रूप बदलना |
| 2 छः दिन के बाद प्रभु यीशु पतरस, याकूब और यूहन्ना को अपने साथ ले गये। वे उन्हें एक ऊँचे पहाड़ पर ले गये। वहाँ और कोई नहीं था। उनके सामने प्रभु यीशु ने अपना रूप बदला। |
| 3 उनके कपड़े चमकीले और बर्फ़ की तरह सफ़ेद हो गये। इस दुनियाँ में कोई भी उन कपड़ों को इतना सफ़ेद नहीं बना सकता था। |
| 4 तब प्रभु का संदेश लाने वाले एलिय्याह और मूसा प्रकट हुए और प्रभु यीशु से बात करने लगे। |
| 5 पतरस ने प्रभु से कहा, “गुरु जी, हमारे लिए यहाँ पर रहना बहुत अच्छा है। चलिए, हम तीन टेन्ट बनाते हैं। एक आपके लिए होगा, एक मूसा के लिए और एक एलिय्याह के लिए।” |
| 6 पतरस वास्तव में नहीं जानता था कि वह क्या कहे क्योंकि यीशु के चेले बहुत डर गये थे। |
| 7 फिर एक बादल उनके ऊपर आया। बादल में से एक आवाज़ ने कहा, “यह मेरा बेटा है और मैं इससे प्यार करता हूँ। इसकी बात सुनो!” |
| 8 पतरस,याकूब और यूहन्ना ने चारों ओर देखा। अचानक उन्होंने अपने साथ प्रभु यीशु के अलावा और किसी को नहीं देखा। |
| 9 वे पहाड़ से नीचे आये। रास्ते में आते हुए, प्रभु ने उन्हें आज्ञा दी कि जो कुछ उन्होंने देखा वे किसी को न बतायें। प्रभु ने उन्हें तब तक इन्तज़ार करने को कहा जब तक वे, आदमी के बेटे, मरे हुओं में से जीवित न हो जायें। |
| 10 इसलिए उन्होंने ये बात अपने तक ही रखी। लेकिन वे एक दूसरे से पूछ रहे थे, “‘मरे हुओं में से जी उठने’ का क्या मतलब है?” |
| 11 फिर उन्होंने प्रभु यीशु से पूछा, “कानून के शिक्षक ऐसा क्यों कहते हैं कि प्रभु का संदेश लाने वाले एलिय्याह को मसीह के आने से पहले लौटना है?” |
| 12 प्रभु ने जवाब दिया, “यह सही है। प्रभु का संदेश लाने वाले एलिय्याह को हर चीज़ की व्यवस्था करने के लिए पहले ही आना है। तो सृष्टि के परमेश्वर की पवित्र किताब में ऐसा क्यों लिखा है कि मुझे, आदमी के बेटे को, बहुत दुख उठाना होगा और मैं शून्य की तरह बनाया जाऊँगा? |
| 13 लेकिन मैं तुम से कहता हूँ कि प्रभु का संदेश लाने वाला एलिय्याह पहले ही आ चुका है। और लोगों ने उसके साथ वह सब कुछ किया जो वे करना चाहते थे। सृष्टि के परमेश्वर की पवित्र किताब में जैसी भविष्यवाणी की गयी थी लोगों ने बिल्कुल वैसा ही किया।” |
| प्रभु यीशु का एक लड़के को ठीक करना जिसमें बुरी आत्मा है |
| 14 जब प्रभु यीशु अपने चेलों के पास आये तब उन्होंने चेलों के चारों ओर बहुत बड़ी भीड़ देखी। और सृष्टि के परमेश्वर के कानून के शिक्षक उनके साथ बहस कर रहे थे। |
| 15 प्रभु को देखकर लोग बहुत हैरान हुए। और वे उन्हें नमस्कार करने के लिए दौड़े। |
| 16 प्रभु ने पूछा, “तुम उनके साथ किस बारे में बहस कर रहे हो?” |
| 17 भीड़ में से एक आदमी ने जवाब दिया, “गुरु जी, मैं अपने बेटे को आपके पास लाया था। वह एक गूँगी आत्मा के वश में है। |
| 18 जब वह आत्मा उसे पकड़ती है तो उसे ज़मीन पर गिरा देती है। वह अपने मुँह से झाग निकालता है और अपने दाँत पीसता है। और उसका शरीर अकड़ जाता है। मैंने आपके चेलों से उस आत्मा को निकालने के लिए कहा। लेकिन वे नहीं कर सके।” |
| 19 प्रभु ने कहा, “हे अविश्वासी पीढ़ी! मुझे तुम्हारे साथ कितने समय तक रहना है? मुझे तुम्हारे साथ और कितना सहन करना है? लड़के को मेरे पास लाओ।” |
| 20 इसलिए वे लड़के को लाये। जैसे ही बुरी आत्मा ने प्रभु को देखा, उसने बच्चे को बहुत तेज़ी से हिलाया। लड़का ज़मीन पर गिया गया। वह चारों ओर लोटने लगा और मुँह से झाग निकाला। |
| 21 प्रभु यीशु ने लड़के के पिता से पूछा, “उसके साथ ऐसा कब से हो रहा है?” पिता ने जवाब दिया, “बचपन से। |
| 22 बुरी आत्मा ने उसे मारने के लिए कई बार आग या पानी में फेंका है। लेकिन अगर आप कुछ कर सकते हैं तो हम पर दया करके हमारी मदद करें।” |
| 23 प्रभु ने पूछा, “‘अगर मैं कर सकता हूँ’ से तुम्हारा क्या मतलब है? जो विश्वास करता है उसके लिए सब कुछ मुमकिन है।” |
| 24 उसी समय लड़के का पिता रोकर चिल्लाया, “प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ! मुझे अविश्वास से उबरने के लिए मेरी मदद कीजिए!” |
| 25 प्रभु यीशु ने देखा कि भीड़ उनकी तरफ़ दौड़ रही थी। तब उन्होंने बुरी आत्मा को लड़के को छोड़ने की आज्ञा दी, “तू बहरी और गूँगी आत्मा, मैं तुझे आज्ञा देता हूँ कि इस लड़के से बाहर निकल जा और फिर कभी इसमें प्रवेश न करना!” |
| 26 बुरी आत्मा चिल्लाई। उसने लड़के को तेज़ी से हिलाया। फिर बुरी आत्मा उसमें से निकल गयी। लड़का बहुत कमज़ोर और मरा हुआ सा लग रहा था। भीड़ में से कई लोगों ने कहा, “वह मर गया है।” |
| 27 लेकिन प्रभु यीशु ने लड़के का हाथ पकड़कर उसे उठाया। उन्होंने उसे उसके पैरों पर खड़ा किया और लड़का खड़ा हो गया। |
| 28 बाद में प्रभु अपने चेलों के साथ घर पर थे। चेलों ने उनसे अकेले में पूछा, “हम बुरी आत्मा को क्यों नहीं निकाल पाये?” |
| 29 उन्होंने जवाब दिया, “इस तरह की आत्मा सिर्फ़ प्रार्थना और उपवास से ही निकल सकती हैं।” |
| 30 फिर वे उस जगह से निकलकर गलील प्रदेश से होकर गुज़रे। प्रभु यीशु नहीं चाहते थे कि कोई भी जाने कि वे कहाँ हैं। |
| 31 ऐसा इसलिए था क्योंकि प्रभु अपने चेलों को शिक्षा दे रहे थे। उन्होंने अपने चेलों से कहा, “आदमी के बेटे को धोखा दिया जायेगा। लोग उसे मार डालेंगे लेकिन तीन दिन के बाद वह मरे हुओं में से जीवित हो जायेगा।” |
| 32 लेकिन यीशु के चेले उनका मतलब नहीं समझ पाये। और वे प्रभु से इसके बारे में पूछने से डरते थे। |
| सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति कौन है? |
| 33 प्रभु यीशु और उनके चेले कफरनहूम में एक घर में आये। वहाँ प्रभु ने उनसे पूछा, “तुम सड़क पर किस बारे में बहस कर रहे थे?” |
| 34 लेकिन वे चुप रहे। रास्ते में उन्होंने इस बारे में बहस की थी कि उनमें सबसे बड़ा कौन है। |
| 35 प्रभु बैठे और बारह दूतों को अपने पास बुलाया। प्रभु ने कहा, “अगर कोई पहली जगह लेना चाहता है तो वह आखिरी जगह ले और सब का सेवक बने।” |
| 36 फिर प्रभु ने एक बच्चे को उनके बीच में खड़ा किया। उन्होंने उस बच्चे को गोद में उठाकर अपने चेलों से कहा, |
| 37 “जो कोई मेरे नाम से इन छोटे बच्चों में से किसी एक का स्वागत करता है वह मेरा स्वागत करता है। और जो कोई मेरा स्वागत करता है वह सिर्फ़ मेरा ही नहीं लेकिन मेरे पिता का भी स्वागत करता है जिन्होंने मुझे भेजा है।” |
| जो कोई हमारे खिलाफ़ नहीं वह हमारे लिए है |
| 38 यूहन्ना ने प्रभु यीशु से कहा, “गुरु जी, हमने एक आदमी को देखा जो बुरी आत्माओं को निकालने के लिए आपके नाम का इस्तेमाल कर रहा था। लेकिन वह हमारे पीछे नहीं चला। और हमने उसे रोकने के लिए कहा क्योंकि वह हम में से एक नहीं है।” |
| 39 प्रभु ने जवाब दिया, “उसे मत रोको! कोई भी जो मेरे नाम से चमत्कार करता है वह उसके अगले पल मेरे बारे में बुरा नहीं बोल सकता। |
| 40 जो कोई हमारे खिलाफ़ नहीं है वह हमारे लिए है। |
| 41 सोचो, अगर कोई मेरे नाम से तुम्हें एक कप पानी देता है क्योंकि तुम मेरे, मसीह के हो। मैं तुम से सच कहता हूँ कि वह व्यक्ति अपना इनाम पाकर रहेगा।” |
| लोगों को पाप की ओर ले जाना |
| 42 प्रभु यीशु ने आगे कहा, “अगर कोई इन छोटों में से एक को जो मुझ पर विश्वास करता है पाप की ओर ले जाये तो क्या होगा? अगर वह ऐसा करता है तो उसके लिए यह ज़्यादा अच्छा होगा कि उसके गले में चक्की का पत्थर बाँधकर उसे समुद्र में फेंक दिया जाये।” |
| 43 अगर तुम्हारा हाथ तुमसे पाप करवाये तो उसे काट दो। तुम्हारे लिए नरक की अनन्त आग में दो हाथों के साथ जाने से ज़्यादा अच्छा है कि तुम सिर्फ़ एक हाथ के साथ अनन्त जीवन में प्रवेश करो। |
| 44 नरक में कीड़ा कभी नहीं मरता और आग कभी नहीं बुझती। |
| 45 अगर तुम्हारा पैर तुमसे पाप करवाये तो उसे काट दो। तुम्हारे लिए नरक की अनन्त आग में दो पैरों के साथ फेंके जाने से ज़्यादा अच्छा है कि तुम सिर्फ़ एक पैर के साथ अनन्त जीवन में प्रवेश करो। |
| 46 नरक में कीड़ा कभी नहीं मरता और आग कभी नहीं बुझती। |
| 47 और अगर तुम्हारी आँख तुमसे पाप करवाये तो उसे निकाल दो। तुम्हारे लिए नरक की आग में दो आँखों के साथ फेंके जाने से ज़्यादा अच्छा है कि तुम सिर्फ़ एक आँख के साथ अनन्त जीवन में प्रवेश करो। |
| 48 नरक में कीड़ा कभी नहीं मरता और आग कभी नहीं बुझती। |
| 49 हर किसी को आग से शुद्ध किया जायेगा। और हर बलिदान नमक से नमकीन किया जायेगा। |
| 50 नमक अच्छा है। लेकिन अगर यह अपना स्वाद खो दे तो तुम इसे फिर से कैसे नमकीन बना सकते हो? अपने अन्दर नमक के गुण लाओ। और एक दूसरे के साथ शान्ति से रहो।” |
अध्याय 10 |
| प्रभु यीशु का तलाक के बारे में बोलना |
| 1 प्रभु यीशु उस जगह से निकलकर यरदन नदी के पार यहूदिया प्रदेश में चले गये। फिर से लोगों की भीड़ उनके पास आयी। हर बार की तरह प्रभु ने उन्हें शिक्षा दी। |
| 2 कुछ फरीसियों ने आकर प्रभु को इस सवाल से फँसाने की कोशिश की, “क्या कानून आदमी को अपनी पत्नी को तलाक देने की अनुमति देता है?” |
| 3 प्रभु यीशु ने जवाब दिया, “प्रभु का संदेश लाने वाले मूसा ने तुम्हें क्या आज्ञा दी थी?” |
| 4 फरीसियों ने कहा, “मूसा ने आदमी को तलाक पत्र लिखकर अपनी पत्नी को निकालने की आज्ञा दी थी।” |
| 5 प्रभु यीशु ने जवाब दिया, “उसने वे आदेश सिर्फ़ तुम्हारे कठोर दिलों के कारण लिखे। |
| 6 सृष्टि के परमेश्वर की पवित्र किताब कहती है कि शुरुआत में परमेश्वर ने सब कुछ बनाया। उन्होंने आदमी और औरत को बनाया। |
| 7 इस कारण आदमी अपने माता-पिता को छोड़ेगा। और वह अपनी पत्नि के साथ एक होगा। |
| 8 पति और पत्नि एक शरीर बनेंगे। इसलिए अब वे दो नहीं लेकिन एक शरीर हैं। |
| 9 इसलिए जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है उसे मनुष्य अलग न करे।” |
| 10 बाद में जब प्रभु यीशु अपने चेलों के साथ घर पर थे तब चेलों ने प्रभु से इसके बारे में फिर से पूछा। |
| 11 उन्होंने जवाब दिया, “अगर एक आदमी अपनी पत्नि को तलाक देकर किसी दूसरी औरत से शादी कर ले तो क्या होता है? वह उसके खिलाफ़ व्यभिचार करता है। |
| 12 और अगर एक औरत अपने पति को तलाक देकर किसी दूसरे आदमी से शादी कर ले तो क्या होता है? वह व्यभिचार करती है। |
| लोगों का छोटे बच्चों को प्रभु यीशु के पास लाना |
| 13 लोग छोटे बच्चों को प्रभु यीशु के पास ला रहे थे। वे चाहते थे कि प्रभु उनके बच्चों को छुएं। लेकिन यीशु के चेलों ने लोगों को रोका। |
| 14 जब प्रभु ने यह देखा तो वे गुस्सा हो गये। उन्होंने अपने चेलों से कहा, “बच्चों को मेरे पास आने दो। उन्हें मत रोको क्योंकि परमेश्वर का राज्य इन्ही जैसे लोगों का है। |
| 15 सच यह है कि आदमी को परमेश्वर का राज्य छोटे बच्चे की तरह स्वीकार करना चाहिए। नहीं तो वह उसमें कभी प्रवेश नहीं करेगा।” |
| 16 तब प्रभु ने बच्चों को अपनी गोद में लिया। उन्होंने अपने हाथ बच्चों के ऊपर रखकर उन्हें आशीष दी। |
| प्रभु यीशु और एक अमीर जवान आदमी |
| 17 प्रभु यीशु अपनी यात्रा पर निकल गये। एक आदमी दौड़कर उनके पास आया और घुटनों पर बैठकर पूछा, “अच्छे गुरु जी, अनन्त जीवन पाने के लिए मुझे क्या करना होगा?” |
| 18 प्रभु ने उसे जवाब दिया, “तुम मुझे अच्छा क्यों कहते हो? परमेश्वर के अलावा कोई भी अच्छा नहीं है।” |
| 19 तुम जानते हो कि सृष्टि के परमेश्वर का कानून क्या कहता है: हत्या मत करो। व्यभिचार मत करो। चोरी मत करो। झूठ मत बोलो। धोखा मत दो। अपने माता-पिता को सम्मान दो।” |
| 20 उस आदमी ने जवाब दिया, “गुरु जी, मैंने बचपन से ही परमेश्वर के इन सब कानूनों का पालन किया है।” |
| 21 जब प्रभु ने उस आदमी को देखा तो उन्हें उस पर बहुत प्यार आया। उन्होंने कहा, “तुम में सिर्फ़ एक बात की कमी है। जाओ और जो कुछ तुम्हारे पास है सब बेच दो। गरीबों को पैसे दो और तुम्हें स्वर्ग में खज़ाना मिलेगा। तब आओ और क्रूस उठाकर मेरे पीछे चलो।” |
| 22 जब उस आदमी ने प्रभु की बात सुनी तो उसका चेहरा उतर गया। वह दुखी होकर चला गया क्योंकि वह बहुत अमीर था। |
| 23 प्रभु यीशु ने चारों ओर देखकर अपने चेलों से कहा, “अमीर लोगों के लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना कितना मुश्किल है!” |
| 24 यीशु के चेले उनकी बात सुनकर हैरान हो गये। लेकिन प्रभु ने फिर से कहा, “बच्चों, जो आपना विश्वास पैसों पर रखते हैं उनके लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना कितना मुश्किल है!” |
| 25 एक ऊँट का सुई की आँख में से निकलना एक अमीर आदमी के परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने से ज़्यादा आसान है!” |
| 26 यीशु के चेले और ज़्यादा हैरान हो गये। उन्होंने एक दूसरे से कहा, “फिर कौन बचाया जा सकता है?” |
| 27 प्रभु यीशु ने उन्हें देखकर कहा, “आदमी के साथ यह नामुमकिन है लेकिन परमेश्वर के साथ नहीं। परमेश्वर के साथ सब कुछ मुमकिन है।” |
| 28 तब पतरस ने प्रभु यीशु से कहा, “हमने आपके पीछे चलने के लिए सब कुछ छोड़ दिया!” |
| 29 प्रभु ने जवाब दिया, “जो मैं तुम्हें बताने वाला हूँ वह सच है। एक ऐसे आदमी के बारे में सोचो जिसने इनमें से कुछ भी घर, भाई, बहनें, पिता, माता, पत्नि, बच्चे या ज़मीन छोड़ दी। उसने ऐसा बलिदान मेरे और पापों से माफ़ी के बारे में मेरे संदेश के लिए किया। |
| 30 उस आदमी ने जो कुछ छोड़ दिया वह उसके बदले में अपने जीवन काल में 100 गुना ज़्यादा पायेगा। उसके पास इस दुनियाँ में घर, भाई, बहनें, माता, बच्चे और ज़मीन होगी। लेकिन उसे तैयार रहना चाहिए कि अविश्वासी लोग मुझ पर उसके विश्वास के कारण उसे बहुत सताएंगे। अन्त में आने वाली दुनियाँ में वह अनन्त जीवन पायेगा। |
| 31 लेकिन बहुत से लोग जो पहले हैं वे आखिरी होंगे। और जो आखिरी हैं वे पहले होंगे।” |
| प्रभु यीशु का फिर से अपनी आने वाली मौत के बारे में बताना |
| 32 यरूशलेम जाते हुए रास्ते में प्रभु यीशु अपने चेलों के आगे चल रहे थे। यीशु के चेले और पीछे चलने वाले लोग बहुत डरे हुए थे। प्रभु यीशु फिर से बारह दूतों को अलग ले गये। उन्होंने चेलों को बताया कि उनके साथ क्या होने वाला था। |
| 33 उन्होंने कहा, “हम यरूशलेम जा रहे हैं। मुझे, आदमी के बेटे को वहाँ धोखा दिया जायेगा। मुझे मुख्य पुरोहितों और कानून के शिक्षकों के हवाले कर दिया जायेगा। वे मुझे मौत की सज़ा देंगे। फिर वे मुझे उन लोगों के हवाले कर देंगे जो यहूदी नहीं हैं। |
| 34 लोग मेरा मज़ाक बनायेंगे और मुझ पर थूकेंगे। वे मुझे मारेंगे और मेरी हत्या कर देंगे। लेकिन तीन दिन के बाद मैं मरे हुओं में से जीवित हो जाऊँगा!” |
| याकूब और यूहन्ना का प्रभु यीशु से माँगना |
| 35 याकूब और यूहन्ना प्रभु यीशु के पास आये। वे जब्दी के बेटे थे। उन्होंने कहा, “गुरु जी, हम चाहेंगे कि हम आप से जो माँगें आप हमारे लिए वही करें।” |
| 36 प्रभु ने पूछा, “तुम क्या चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिए करूँ?” |
| 37 उन्होंने जवाब दिया, “अपनी महिमा में हम में से एक को अपनी दाईं और दूसरे को बाईं ओर बैठने दें।” |
| 38 लेकिन प्रभु यीशु ने जवाब दिया, “तुम नहीं जानते कि तुम क्या माँग रहे हो! क्या तुम उस दुख के प्याले को पी सकते हो जो मुझे पीना है? क्या तुम उस दुख से स्नान कर सकते हो जिससे मुझे करना है?” |
| 39 उन्होंने जवाब दिया, “हम कर सकते हैं।” प्रभु ने उनसे कहा, “तुम उस प्याले से पियोगे जिससे मैं पीता हूँ। और तुम वह स्नान लोगे जो मैं लेता हूँ। |
| 40 लेकिन मुझे यह कहने का कोई अधिकार नहीं है कि मेरी दाईं या बाईं ओर कौन बैठेगा। सृष्टि के परमेश्वर ने ऐसा सम्मान उनके लिए तैयार किया है जिन्हें उन्होंने चुना है।” |
| 41 दूसरे दस दूतों ने याकूब और यूहन्ना की माँग के बारे में सुना। वे याकूब और यूहन्ना पर गुस्सा हुए। |
| 42 प्रभु यीशु ने अपने चेलों को एक साथ बुलाकर कहा, “तुम उनके बारे में जानते हो जो राष्ट्रों के राजा हैं। वे अपने लोगों के ऊपर अधिकार रखते हैं। और उनके बड़े अधिकारियों को अपने से छोटों पर अधिकार है। |
| 43 लेकिन तुम उनकी तरह मत बनो। इसके बजाय तुममें से जो कोई महत्वपूर्ण बनना चाहता है वह तुम्हारा सेवक बने। |
| 44 और जो कोई पहला बनना चाहता है वह सबका गुलाम बने। |
| 45 मैं, आदमी का बेटा भी खुद की सेवा करवाने के लिए नहीं आया। बल्कि मैं दूसरों की सेवा करने और बहुत से लोगों की आज़ादी के लिए अपने जीवन का बलिदान देने आया। |
| अन्धे बरतिमाई का आँखों की रोशनी पाना |
| 46 प्रभु यीशु और उनके चेले यरीहो आये। जब वे शहर से जा रहे थे तो एक बड़ी भीड़ उनके साथ थी। एक अन्धा भिखारी सड़क के किनारे बैठा हुआ था। उसका नाम बरतिमाई था। बरतिमाई का मतलब है तिमाई का बेटा। |
| 47 उसने सुना कि नासरत के यीशु वहाँ से गुज़र रहे थे। इसलिए वह चिल्लाने लगा, “प्रभु यीशु! दाऊद के बेटे! मुझ पर दया करो!” |
| 48 बहुत से लोगों ने उसे रोकने की कोशिश की, “चुप रहो!” लेकिन वह और ज़ोर से चिल्लाया, “दाऊद के बेटे! मुझ पर दया करो!” |
| 49 प्रभु यीशु ने रुककर कहा, “उसे बुलाओ।” इसलिए लोगों ने अन्धे आदमी को बुलाया, “खुश हो जाओ! खड़े उठो, प्रभु तुम्हें बुला रहे हैं!” |
| 50 बरतिमाई ने अपना कोट एक तरफ़ फेंका और जल्दी से उठकर प्रभु के पास आया। |
| 51 प्रभु ने उससे पूछा, “तुम क्या चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिए करूँ?” अन्धे आदमी ने कहा, “गुरु जी, मैं देखना चाहता हूँ।” |
| 52 प्रभु ने कहा, “जाओ। तुम्हारे विश्वास ने तुम्हें बचा लिया है।” उसी समय अन्धा आदमी देखने लगा! फिर वह सड़क पर प्रभु यीशु के पीछे चला। |
अध्याय 11 |
| प्रभु यीशु का यरूशलेम में प्रवेश करना |
| 1 प्रभु यीशु और उनके चेले यरूशलेम के नज़दीक पहुँचे। वे जैतून पर्वत पर बैतफगे और बैतनिय्याह के शहर में आये। तब प्रभु ने अपने दो चेलों को भेजा। |
| 2 प्रभु ने उनसे कहा, “आगे के गाँव में जाओ। जैसे ही तुम वहाँ प्रवेश करोगे तुम्हें एक गधे का बच्चा बँधा हुआ मिलेगा। उस पर अभी तक कोई भी सवार नहीं हुआ है। उसे खोलकर यहाँ ले आओ। |
| 3 अगर कोई पूछे कि तुम क्या कर रहे हो, तो कहना, ‘प्रभु को गधे की ज़रूरत है, और वे इसे जल्दी ही वापस कर देंगे।’ |
| 4 दो चेले गये और उन्होंने गधे के बच्चे को बाहर सड़क पर पाया। वह एक द्वार पर बँधा हुआ था। उन्होंने उसे खोला। |
| 5 वहाँ पर खड़े कुछ लोगों ने उनसे पूछा, “तुम क्या कर रहे हो? तुम उस गधे को क्यों खोल रहे हो?” |
| 6 यीशु के चेलों ने उनसे वही कहा जो प्रभु ने उनसे कहने को कहा था। इसलिए लोगों ने उन्हें जाने दिया। |
| 7 दो चेले गधे को प्रभु के पास लाये। फिर उन्होंने अपने कपड़े गधे के ऊपर डाले और प्रभु उस पर बैठ गये। |
| 8 भीड़ में से कई लोगों ने अपने कपड़े प्रभु यीशु के आगे सड़क पर बिछाये। दूसरे लोगों ने पेड़ की शाखाओं को काटकर सड़क पर बिछाया। |
| 9 प्रभु यीशु बीच में थे और उनके चारों ओर के लोग चिल्ला रहे थे, “परमेश्वर की प्रशंसा हो! जो प्रभु के नाम से आते हैं वे आशीषित हैं! |
| 10 हमारे पिता दाऊद का आने वाला राज्य आशीषित है! सबसे ऊँचे स्वर्ग में परमेश्वर की प्रशंसा हो!” |
| 11 प्रभु यीशु यरूशलेम में प्रवेश करके सृष्टि के परमेश्वर के मन्दिर में गये। प्रभु ने चारों ओर सब कुछ देखा। लेकिन शाम हो चुकी थी। इसलिए वे अपने बारह चेलों के साथ बैतनिय्याह को चले गये। |
| प्रभु यीशु का सृष्टि के परमेश्वर के मन्दिर में आना |
| 12 दूसरी सुबह जब वे बैतनिय्याह से जा रहे थे तो प्रभु यीशु को भूख लगी। |
| 13 प्रभु ने दूर से एक अंजीर का पेड़ देखा। वह पत्तों से भरा हुआ था। वे उस पर फल ढूँढ़ने के लिए गये। जब प्रभु उसके पास आये तो उन्हें पत्तों के सिवाय कुछ नहीं मिला। यह फल का मौसम नहीं था। |
| 14 तब प्रभु ने पेड़ से कहा, “तुझ में से अब कोई भी फल न खाये!” और उनके चेलों ने यह सुना। |
| 15 प्रभु यीशु और उनके चेले यरूशलेम में वापस आये। प्रभु ने सृष्टि के परमेश्वर के मन्दिर में प्रवेश किया। प्रभु उन लोगों को वहाँ से निकालने लगे जो सामान खरीद और बेच रहे थे। उन्होंने पैसों की अदला-बदली करने वालों की टेबल को पलट दिया। उन्होंने उन लोगों के बेंच को भी पलट दिया जो कबूतर बेच रहे थे। |
| 16 और प्रभु ने किसी को भी मन्दिर में सामान बेचने के लिए नहीं ले जाने दिया। |
| 17 प्रभु ने उन्हें सिखाया, “सृष्टि के परमेश्वर ने अपना संदेश लाने वाले यशायाह द्वारा अपनी किताब में यह लिखा था, ‘मेरा घर सभी राष्ट्रों के लिए प्रार्थना का घर कहलायेगा।’ लेकिन तुमने मेरे घर को ‘चोरों का घर’ बना दिया है, जैसे प्रभु का संदेश लाने वाले यिर्मयाह ने भविष्यवाणी की थी।” |
| 18 मुख्य पुरोहितों और कानून के शिक्षकों ने इस बारे में सुना। वे प्रभु यीशु को मारने की योजना बनाने लगे। वे प्रभु से डरते थे क्योंकि सभी लोग उनकी शिक्षाओं से हैरान थे। |
| 19 जब शाम हुई तो प्रभु यीशु उस शहर से चले गये। |
| अंजीर के पेड़ का सूखना |
| 20 अगली सुबह जब प्रभु और उनके चेले जा रहे थे तब उन्होंने देखा कि अंजीर का पेड़ जड़ तक सूख गया था। |
| 21 पतरस को जो प्रभु ने कल किया था याद आया। उसने कहा, “गुरु जी, देखिए! जिस पेड़ को आपने श्राप दिया था वह सूख चुका है!” |
| 22 तब प्रभु यीशु ने अपने चेलों से कहा, “परमेश्वर के जैसा विश्वास रखो। |
| 23 अभी जो मैं तुम्हें बताने वाला हूँ वह सच है। अगर कोई इस पहाड़ से कहे, ‘जा और खुद को समुद्र में गिरा दे।’ उसे अपने दिल में शक नहीं करना है। लेकिन विश्वास करना है कि जो वह कहता है हो जायेगा। तब वह जो कुछ कहता है वह उसके पास होगा। |
| 24 इसलिए मैं तुम से कहता हूँ जो कुछ तुम प्रार्थना में माँगते हो विश्वास करो कि वह तुम्हें मिल गया है और वह तुम्हारा होगा। |
| 25 और जब तुम प्रार्थना करते हो तब अगर तुम्हारे दिल में किसी के खिलाफ़ कुछ है तो तुम उसे माफ़ कर दो। ताकि तुम्हारे स्वर्गीय पिता तुम्हारे पाप माफ़ कर दें। |
| 26 लेकिन अगर तुम माफ़ नहीं करते तो तुम्हारे स्वर्गीय पिता भी तुम्हारे पाप माफ़ नही करेंगे।” |
| प्रभु यीशु के अधिकार के बारे में सवाल |
| 27 प्रभु यीशु और उनके चेले फिर से यरूशलेम में पहुँचे। प्रभु सृष्टि के परमेश्वर के मन्दिर में टहल रहे थे। मुख्य पुरोहित, कानून के शिक्षक और बुज़ुर्ग लोग उनके पास आये। |
| 28 उन्होंने पूछा, “तुम यह सब किस अधिकार से कर रहे हो? और तुम्हें ऐसा करने का अधिकार किसने दिया?” |
| 29 प्रभु ने जवाब दिया, “मैं तुम से एक सवाल पूछूँगा। मुझे जवाब दो, और मैं तुम्हें बताऊँगा कि मैं यह सब किस अधिकार से कर रहा हूँ। |
| 30 क्या यूहन्ना को परमेश्वर ने भेजा था कि वह लोगों को सृष्टि के परमेश्वर के नाम से पवित्र स्नान दे? क्या यह स्वर्ग से था या लोगों से? मुझे बताओ!” |
| 31 उन्होंने इस बारे में एक-दूसरे से बात की, “अगर हम कहें, ‘परमेश्वर ने यूहन्ना को भेजा’ तो यीशु पूछेगा, ‘फिर तुमने यूहन्ना पर विश्वास क्यों नहीं किया?” |
| 32 और हम यह नहीं कह सकते, ‘यह लोगों से था,’ क्योंकि हर कोई विश्वास करता है कि यूहन्ना सच में प्रभु का संदेश लाने वाला था।” वे लोगों से डरते थे। |
| 33 इसलिए उन्होंने जवाब दिया, “हम नहीं जानते।” प्रभु ने कहा, “फिर मैं भी तुम्हें नहीं बताऊँगा कि मैं यह सब किस अधिकार से करता हूँ।” |
अध्याय 12 |
| किरायेदारों की कहानी |
| 1 प्रभु यीशु लोगों को कहानी सुनाने लगे। उन्होंने कहा, “एक आदमी ने अंगूर का बगीचा लगाया। उसने उसके चारों ओर दीवार बनायी। उसने अंगूर का रस निकालने के लिए एक गड्ढा बनाया। उसने एक मीनार भी बनायी। फिर उसने अंगूर का बगीचा कुछ किसानों को किराये पर दे दिया। और वह यात्रा पर चला गया।” |
| 2 फ़सल के समय मालिक ने एक नौकर को किरायेदारों के पास भेजा। उसने नौकर को अंगूर के बगीचे से उनके लिए कुछ फल लाने को कहा। |
| 3 लेकिन किरायेदारों ने नौकर को पकड़कर पीट दिया। फिर उन्होंने उसे खाली हाथ भेज दिया। |
| 4 इसलिए मालिक ने दूसरे नौकर को किरायेदारों के पास भेजा। लेकिन उन्होंने पत्थर से उसके सिर पर मारा और उसके साथ शर्मनाक व्यवहार किया। |
| 5 तब मालिक ने दूसरे नौकर को भेजा। लेकिन किरायेदारों ने उसे भी मार डाला। मालिक ने बहुत से दूसरे नौकरों को भेजा। लेकिन उनमें से कुछ को किरायेदारों ने पीट दिया और दूसरों को मार डाला। |
| 6 अब मालिक के पास भेजने के लिए एक ही आदमी बचा था। वह उसका बेटा था और वह उससे प्यार करता था। उसने उसे सबसे अन्त में भेजा। उसने कहा, ‘वे मेरे बेटे का आदर करेंगे।’ |
| 7 लेकिन किरायेदारों ने एक दूसरे से कहा, ‘यह वही है जो मालिक की सारी जायदाद का वारिस बनेगा।’ इसे मार देते हैं फिर सब कुछ हमारा हो जायेगा। |
| 8 इसलिए उन्होंने उसे पकड़कर मार डाला। फिर उन्होंने उसे अंगूर के बगीचे के बाहर फेंक दिया। |
| 9 अंगूर के बगीचे का मालिक क्या करेगा? वह आकर उन सब किरायेदारों को मार देगा। और वह अंगूर का बगीचा दूसरे लोगों को दे देगा। |
| 10 क्या तुमने सृष्टि के परमेश्वर की पवित्र किताब में यह कभी नहीं पढ़ा? ‘जिस पत्थर को मिस्त्रियों ने ठुकरा दिया वह मकान की नीव का सबसे महत्वपूर्ण पत्थर बना। |
| 11 यह प्रभु ने किया है। यह देखने में बहुत हैरान करने वाला है!’ |
| 12 तब धार्मिक नेता प्रभु यीशु को पकड़ने का रास्ता ढूँढ़ने लगे। वे जानते थे कि प्रभु ने यह कहानी उनके खिलाफ़ सुनायी थी। लेकिन वे भीड़ से डर गये। इसलिए वे प्रभु को छोड़कर चले गये। |
| क्या सरकार को टैक्स देना ठीक है? |
| 13 बाद में धार्मिक नेताओं ने कुछ फरीसियों और राजा हेरोदेस के सहायकों को प्रभु यीशु के पास भेजा। वे प्रभु को उन्हीं के शब्दों में फँसाना चाहते थे। |
| 14 उन्होंने प्रभु के पास आकर कहा, “गुरु जी, हम जानते हैं कि आप कितने इमानदार हैं। आप दूसरों को यह नहीं बोलने देते कि आपको क्या करना या कहना है। आप लोगों के पद पर ध्यान नहीं देते। लेकिन आप सच्चाई से परमेश्वर के रास्ते के बारे में शिक्षा देते हैं। क्या सरकार को टैक्स देना ठीक है या नहीं? |
| 15 क्या हमें यह देना चाहिए या नहीं?” लेकिन प्रभु यीशु जानते थे कि वे पाखण्डी थे। प्रभु उनके झूठे दिल देख सकते थे। इसलिए प्रभु यीशु ने पूछा, “तुम मुझे फँसाने की कोशिश क्यों कर रहे हो? एक चाँदी का सिक्का मेरे पास लाओ। मुझे उसे देखने दो।” |
| 16 वे सिक्का लाये। फिर प्रभु ने उनसे पूछा, “इस सिक्के पर किसकी तसवीर और किसके शब्द हैं?” उन्होंने जवाब दिया, “यह सरकार के मुखिया, कैसर की तसवीर है।” |
| 17 तब प्रभु ने उनसे कहा, “जो सरकार का है उसे सरकार को दो। और जो परमेश्वर का है उसे परमेश्वर को दो। यीशु के जवाब ने उन्हें पूरी तरह से हैरान कर दिया।” |
| क्या मरे हुए लोग शादी करेंगे? |
| 18 यहूदियों का एक समूह सदूकी कहलाता था। वे विश्वास नहीं करते थे कि मरे हुए लोग फिर से जीवित होंगे। उन्होंने प्रभु यीशु के पास आकर उनसे पूछा, |
| 19 “गुरु जी, प्रभु का संदेश लाने वाले मूसा ने हमें एक कानून दिया था। अगर एक आदमी अपनी पत्नि को बच्चे दिये बिना मर जाता है तो उस आदमी के भाई को उसकी विधवा से शादी करनी चाहिए। उसे अपने मरे हुए भाई का वंश चलाने के लिए बच्चा पैदा करना होगा। |
| 20 एक परिवार में सात भाई थे। पहले की शादी हो गई। वह किसी बच्चे को जन्म दिए बिना ही मर गया। |
| 21 दूसरे भाई ने अपने भाई की विधवा से शादी कर ली। वह भी किसी बच्चे को जन्म दिए बिना मर गया। तीसरे भाई के साथ भी ऐसा ही हुआ। |
| 22 इस तरह सातों भाइयों में से किसी का कोई बच्चा नहीं हुआ। अन्त में वह औरत भी मर गयी। |
| 23 अब हमें बताइए जब मरे हुए फिर से जीवित होंगे तब वह किसकी पत्नि होगी? सातों ने उससे शादी की थी।” |
| 24 प्रभु ने जवाब दिया, “तुम्हारी गलती यह है कि तुम नहीं जानते कि सृष्टि के परमेश्वर की पवित्र किताब में क्या लिखा है। और तुम परमेश्वर की शक्ति को नहीं जानते। |
| 25 जब मरे हुए फिर से जीवित होंगे तब वे शादी नहीं करेंगे। और उनके माता-पिता उनकी शादी नहीं करवायेंगे। वे स्वर्ग में दूतों की तरह होंगे। |
| 26 क्या तुमने सृष्टि के परमेश्वर की पवित्र किताब में मरे हुओं के जीवित होने के बारे में नहीं पढ़ा? उस में प्रभु का संदेश लाने वाले मूसा और जलती हुई झाड़ी के बारे में यह लिखा है। सृष्टि के परमेश्वर ने मूसा से कहा, ‘मैं इब्राहीम का परमेश्वर, इसहाक का परमेश्वर और याकूब का परमेश्वर हूँ।’ |
| 27 वे मरे हुओं के परमेश्वर नहीं हैं। वे जीवितों के परमेश्वर हैं। तुम बहुत बड़ी गलतफ़हमी में हो!” |
| सबसे महत्वपूर्ण कानून |
| 28 सृष्टि के परमेश्वर के कानून का एक शिक्षक आया। उसने सदूकियों को प्रभु यीशु से बहस करते हुए सुना। उसने ध्यान दिया कि प्रभु ने सदूकियों को अच्छा जवाब दिया। इसलिए उसने प्रभु से पूछा, “सृष्टि के परमेश्वर ने हमें प्रभु का संदेश लाने वाले मूसा द्वारा कई कानून दिये। उनमें से सबसे महत्वपूर्ण कौन सा है?” |
| 29 प्रभु यीशु ने जवाब दिया, “सबसे महत्वपूर्ण कानून यह है: ‘हे इज्राएल के लोगों, सुनो! सिर्फ़ सृष्टि के परमेश्वर ही हमारे प्रभु हैं। |
| 30 परमेश्वर अपने प्रभु को अपने पूरे दिल, अपने पूरे प्राण, अपने पूरे दिमाग और अपनी पूरी शक्ति से प्यार करो। यह सबसे महत्वपूर्ण कानून है। |
| 31 और दूसरा कानून भी इतना ही महत्वपूर्ण है: ‘अपने पड़ोसी से अपने समान प्यार करो।’ कोई भी कानून इन दो कानूनों से ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं है।” |
| 32 आदमी ने जवाब दिया, “गुरु जी, आपकी बात अच्छी है। यह सच है कि सृष्टि के परमेश्वर सिर्फ़ एक हैं। और दूसरे कोई भगवान नहीं हैं। |
| 33 परमेश्वर को अपने पूरे दिल, अपने पूरे दिमाग, अपने पूरे प्राण और अपनी पूरी शक्ति से प्यार करना ही सबसे महत्वपूर्ण है। और अपने पड़ोसी से अपने समान प्यार करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह अग्नि बलि और सृष्टि के परमेश्वर के कानून में माँगे गये बलिदानों से ज़्यादा महत्वपूर्ण है। |
| 34 प्रभु यीशु ने देखा कि उस आदमी ने बुद्धिमानी से जवाब दिया। उन्होंने उससे कहा, “तुम परमेश्वर के राज्य से दूर नहीं हो।” और उसके बाद किसी को प्रभु से और कोई सवाल पूछने की हिम्मत नहीं हुई। |
| मसीह किसका बेटा है? |
| 35 प्रभु यीशु सृष्टि के परमेश्वर के मन्दिर में शिक्षा दे रहे थे। उन्होंने पूछा, “कानून के शिक्षक क्यों कहते हैं कि मसीह जो सारी सृष्टि के राजा हैं, राजा दाऊद के बेटे हैं? |
| 36 पवित्र आत्मा दाऊद के द्वारा बोली, “प्रभु ने मेरे प्रभु से कहा, ‘जब तक मैं तुम्हारे दुश्मनों को तुम्हारे पैरों के नीचे नहीं डाल देता तब तक मेरी दाईं ओर बैठो।’” |
| 37 अगर दाऊद मसीह को ‘प्रभु’ कहता है तो मसीह दाऊद के बेटे कैसे हो सकते हैं?” बड़ी भीड़ ने प्रभु यीशु को बड़ी रुचि से सुना। |
| 38 फिर प्रभु ने उन्हें शिक्षा दी, “कानून के शिक्षकों से सावधान रहो। वे खास कपड़े पहकर घूमना पसन्द करते हैं। वे पसन्द करते हैं कि लोग बाज़ार में उन्हें नमस्कार करें। |
| 39 वे प्रार्थना घरों में सबसे महत्वपूर्ण जगह और दावतों पर भी सम्मान की जगह पाना पसन्द करते हैं। |
| 40 वे विधवाओं की जायदाद को लूटते हैं। वे दिखावे के लिए लम्बी प्रार्थनाएँ करते हैं। ऐसे लोगों को कड़ी सज़ा मिलेगी।” |
| विधवा की भेट |
| 41 प्रभु यीशु मन्दिर के खज़ाने के सामने बैठे। उन्होंने देखा कि लोग वहाँ अपना पैसा कैसे डालते हैं। बहुत से अमीर लोगों ने बहुत सा पैसा दिया। |
| 42 फिर एक गरीब विधवा ने आकर दो बहुत छोटे सिक्के उसमें डाले। वास्तव में इन सिक्कों की कीमत ज़्यादा नहीं थी। |
| 43 प्रभु ने अपने चेलों को बुलाकर कहा, “सच यह है कि इस गरीब विधवा ने दूसरे सभी लोगों से ज़्यादा बड़ी भेट दी है। |
| 44 उन सब ने इसलिए दिया क्योंकि वे अमीर हैं। लेकिन उस विधवा ने बहुत गरीब होने के बावजूद भी दिया। जो कुछ भी उसके पास था उसने सब दे दिया। उसने वह सब कुछ दे दिया जो उसकी जीविका थी।” |
अध्याय 13 |
| अन्त के चिन्ह |
| 1 प्रभु यीशु सृष्टि के परमेश्वर के मन्दिर से जा रहे थे। उनके एक चेले ने उनसे कहा, “गुरु जी, देखिए! कितने बड़े पत्थर हैं! कितनी बढ़िया इमारतें हैं!” |
| 2 प्रभु ने कहा, “क्या तुम इन बड़ी इमारतों को देखते हो? वे पूरी तरह से नष्ट कर दी जायेंगी! यहाँ एक भी पत्थर दूसरे पत्थर के ऊपर नहीं रहेगा। हर पत्थर गिराया जायेगा।” |
| 3 बाद में प्रभु सृष्टि के परमेश्वर के मन्दिर के सामने जैतून पर्वत पर बैठे थे। पतरस, याकूब, यूहन्ना और अन्द्रियास ने उनसे अकेले में एक सवाल पूछा, |
| 4 “हमें बताइये कि यह सब कब होगा? और यह सब पूरा होने से पहले क्या चिन्ह होंगे?” |
| 5 प्रभु ने जवाब दिया, “सावधान रहो कि कोई तुम्हें बहकाने न पाए। |
| 6 बहुत से लोग मेरे नाम से आयेंगे। वे दावा करेंगे, ‘मैं यीशु मसीह हूँ।’ वे बहुत से लोगों को धोखा देंगे। |
| 7 तुम लड़ाइयों के बारे में सुनोगे और भविष्य की लड़ाइयों के बारे में अफ़वाह सुनोगे। डरना मत। ये बातें होनी हैं, लेकिन यह अन्त नहीं है। |
| 8 राष्ट्र राष्ट्र के खिलाफ़ लड़ेंगे और राज्य राज्य के खिलाफ़। दुनियाँ के अलग–अलग भागों में भूकम्प, अकाल और मुसीबतें आएंगी। जैसे जन्म देने का दर्द बढ़ता चला जाता है उसी तरह यह सब भी आने वाले भय की शुरुआत होगी। |
| 9 लेकिन तुम्हें सतर्क रहना है। लोग तुम्हें कोर्ट के हवाले कर देंगे। वे तुम्हें प्रार्थना घरों में मारेंगे। मेरे चेले होने के कारण वे तुम्हें शासकों और राजाओं के सामने लायेंगे। तब तुम्हारे पास यह मौका होगा कि तुम उन्हें मेरे बारे में बताओ। |
| 10 और यह ज़रूरी है कि पापों से माफ़ी के बारे में मेरा संदेश पहले हर राष्ट्र में प्रचार किया जाए। |
| 11 लोग तुम्हें पकड़कर न्याय के लिए ले जायेंगे। लेकिन तुम चिन्ता मत करना और तुम क्या कहोगे इस बारे में मत सोचना। उस समय जो पवित्र आत्मा तुम्हारे दिमाग में लाये तुम वही कहना। वह तुम नहीं बोल रहे होगे लेकिन पवित्र आत्मा बोल रही होगी। |
| 12 भाई भाई को मारने के लिए विश्वास-घात करेगा। पिता अपने बच्चे को धोखा देगा। बच्चे अपने माता–पिता के खिलाफ़ हो जायेंगे और उन्हें मार डालेंगे। |
| 13 हर कोई मेरे नाम के कारण तुम से नफ़रत करेगा। लेकिन परमेश्वर उन्हें बचायेंगे जो अन्त तक स्थिर रहेंगे। |
| 14 प्रभु का संदेश लाने वाले दनिय्येल ने सृष्टि के परमेश्वर की पवित्र किताब में भविष्यवाणी की थी कि तुम ‘उस अशुद्ध चीज़ को देखोगे जो विनाश करती है।’ यह उस जगह पर होगी जहाँ इसे होने का अधिकार नहीं है।” पढ़ने वालों, ध्यान दो! “तब वे जो यहूदिया प्रदेश में हैं उन्हें जल्दी पहाड़ों पर चले जाना होगा। |
| 15 उस समय कुछ लोग अपने घर की छत पर होंगे। उन्हें अपने घर के अन्दर कुछ भी लेने के लिए नहीं जाना चाहिए। |
| 16 उस समय कुछ लोग खेतों में काम कर रहे होंगे। उन्हें अपने कपड़े लेने के लिए वापस नहीं जाना चाहिए। |
| 17 उन दिनों में गर्भवती औरतों और छोटे बच्चों को दूध पिलाने वाली माताओं के लिए यह कितना भयानक होगा। |
| 18 प्रार्थना करो कि यह सर्दियों में न हो। |
| 19 परमेश्वर के दुनियाँ बनाने से अब तक बहुत से भयानक दिन आये। लेकिन अन्त के दिन और भी भयानक होंगे। और वैसे दिन फिर कभी नहीं आएंगे। |
| 20 लेकिन कुछ लोग जीवित रहेंगे क्योंकि प्रभु उन दिनों को कम कर देंगे। नहीं तो हर कोई मर जाएगा। प्रभु अपने चुने हुए लोगों के कारण उन दिनों को कम करेंगे। |
| 21 उस समय अगर कोई तुम से कहे, ‘देखो! मसीह यहाँ है’ या, ‘मसीह वहाँ है’ तो विश्वास मत करना। |
| 22 झूठे मसीह और झूठे भविष्यवक्ता आयेंगे। वे चिन्ह और चमत्कार करेंगे। अगर यह मुमकिन हो तो वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों को बहकाने की कोशिश करेंगे। |
| 23 सावधान रहो! मैंने यह सब कुछ होने से पहले ही तुम्हें बता दिया है। |
| 24 इसलिए उन दिनों में भयानक दुख होगा। उसके बाद जैसे सृष्टि के परमेश्वर की पवित्र किताब भविष्यवाणी करती है, ‘सूरज अन्धकारमय हो जायेगा। चाँद रोशनी नहीं देगा। |
| 25 आकाश से तारे गिर जायेंगे। स्वर्ग की शक्ति हिला दी जायेगी।’ |
| 26 तब लोग मुझे, आदमी के बेटे को बादलों पर आते देखेंगे। मैं महान शक्ति और महिमा के साथ आऊँगा। |
| 27 मैं अपने स्वर्गदूतों को भेजूँगा। और मैं अपने चुने हुए लोगों को चारों ओर, धरती से लेकर स्वर्ग के छोर तक इकट्ठा करूँगा। |
| 28 अंजीर के पेड़ से उदाहरण लो। जब इसकी शाखाएँ कोमल हो जाती हैं और पत्ते दिखाई देने लगते हैं तो तुम जान लेते हो कि गर्मी नज़दीक है। |
| 29 उसी तरह जब तुम इन बातों को होते हुए देखोगे तो तुम जान लेना कि मैं नज़दीक हूँ। मैं ठीक दरवाज़े पर खड़ा हूँ। |
| 30 सच यह है कि इन सब बातों के होने तक यह पीढ़ी खत्म नहीं होगी। |
| 31 स्वर्ग और धरती मिट जायेंगे। लेकिन मेरे वचन हमेशा रहेंगे।” |
| उस दिन और उस घड़ी को कोई नहीं जानता |
| 32 “मेरे आने के दिन और घड़ी को कोई नहीं जानता। स्वर्गदूत नहीं जानते। मैं, आदमी का बेटा भी नहीं जानता। सिर्फ़ स्वर्गीय पिता जानते हैं। |
| 33 सतर्क रहो, जागते रहो और प्रार्थना करो क्योंकि तुम नहीं जानते कि यह कब होगा। |
| 34 यह एक आदमी के दूर जाने जैसा है। वह अपने घर से चला जाता है और अपने नौकरों को अधिकार देता है। अभी ज़िम्मेदारी उनकी है। वह उनमें से हर एक को काम देता है। वह चौकीदार को पहरेदारी करने की आज्ञा देता है। |
| 35 इसलिए निगरानी करते रहो क्योंकि तुम नहीं जानते कि घर का मालिक कब लौटेगा। वह शाम को या आधी रात में आ सकता है। वह मुर्गे के बांग देते समय या सुबह आ सकता है। |
| 36 जब वह बिना चेतावनी के आता है तो वह तुम्हें सोता हुआ न पाये। |
| 37 और जो मैं तुम से कहता हूँ वह मैं सब से कहता हूँ। सतर्क रहो!” |
अध्याय 14 |
| एक औरत का प्रभु यीशु पर इत्र उड़ेलना |
| 1 यह मिस्र की गुलामी से छुटकारे और रोटी के त्योहार से दो दिन पहले था। मुख्य पुरोहित और कानून के शिक्षक प्रभु यीशु को गिरफ़्तार करने के लिए शातिर रास्ता ढूँढ़ रहे थे। वे प्रभु यीशु को मार डालना चाहते थे। |
| 2 लेकिन उन्होंने कहा, “हम यीशु को त्योहार के दौरान गिरफ़्तार नहीं करेंगे। अगर हम ऐसा करेंगे तो दंगा हो जायेगा।” |
| 3 प्रभु यीशु बैतनिय्याह में शमौन के घर में थे। शमौन एक कोढ़ी था। रात के खाने के समय एक औरत कीमती इत्र के संगमरमर के जार के साथ अन्दर आयी। वह इत्र शुद्ध गुल-मेहंदी से बना था। उसने जार को तोड़कर इत्र को यीशु के सिर पर उड़ेल दिया। |
| 4 वहाँ पर मौजूद कुछ लोग गुस्सा हो गये। उन्होंने एक दूसरे से कहा, “उसने इतना कीमती इत्र बरबाद क्यों किया? |
| 5 इस इत्र का मूल्य एक साल की मज़दूरी से भी ज़्यादा है! हम इसे बेचकर गरीबों को पैसा दे सकते थे!” वे उससे बहुत गुस्सा थे। |
| 6 लेकिन प्रभु यीशु ने कहा, “उसे अकेला छोड़ दो! तुम उसे क्यों परेशान कर रहे हो? उसने मेरे लिए इतना अच्छा काम किया है। |
| 7 गरीब लोग हमेशा तुम्हारे साथ रहेंगे। तुम जब चाहो उनकी मदद कर सकते हो। लेकिन मैं तुम्हारे साथ हमेशा नहीं रहूँगा। |
| 8 वह जो कर सकती थी उसने किया। उसने मुझे दफ़नाने को तैयार करने के लिए समय से पहले ही मेरे शरीर पर इत्र उड़ेला। |
| 9 मैं तुमसे सच कहता हूँ कि लोग उस औरत के बारे में हमेशा याद रखेंगे। मेरे चेले पापों की माफ़ी के बारे में मेरा संदेश पूरी दुनियाँ में प्रचार करेंगे। और इस औरत ने जो मेरे लिए किया है वे उसे हर जगह बतायेंगे।” |
| 10 यहूदा इस्करियोती बारह दूतों में से एक था। वह प्रभु यीशु के साथ विश्वास-घात करने के लिए मुख्य पुरोहितों के पास गया। |
| 11 मुख्य पुरोहित यह सुनकर बहुत खुश हुए कि यहूदा ऐसा करेगा। उन्होंने उसे पैसे देने का वादा किया। इसलिए यहूदा प्रभु यीशु के साथ विश्वास-घात करने के लिए सही मौका ढूँढ़ने लगा। |
| प्रभु की दावत |
| 12 वह रोटी के त्योहार का पहला दिन था। वह मिस्र की गुलामी से छुटकारे के त्योहार के लिए मेमने को बलिदान करने का समय था। यीशु के चेलों ने प्रभु से पूछा, “आप कहाँ चाहते हैं कि हम आपके लिए त्योहार का खाना तैयार करें?” |
| 13 इसलिए प्रभु यीशु ने उनमें से दो को यरूशलेम भेजा। प्रभु ने उनसे कहा, “शहर में जाओ। तुम पानी का बरतन लिए हुए एक आदमी से मिलोगे। उसका पीछा करना। |
| 14 वह आदमी एक घर में घुसेगा। तब उस घर के मालिक से कहना, ‘गुरु जी पूछते हैं, “मेरे लिए कमरा कहाँ है? मैं अपने चेलों के साथ त्योहार का खाना कहाँ खा सकता हूँ?”’ |
| 15 घर का मालिक तुम्हें ऊपर का बड़ा कमरा दिखायेगा। यह सजा हुआ और तैयार होगा। वहाँ हमारे खाने के लिए तैयारी करना।” |
| 16 इसलिए यीशु के दो चेले उस जगह से निकलकर यरूशलेम चले गये। उन्होंने सब कुछ ऐसा ही पाया जैसा प्रभु ने उन्हें बताया था। और उन्होंने त्योहार का खाना वहाँ तैयार किया। |
| 17 शाम को प्रभु अपने बारह दूतों के साथ आये। |
| 18 वे खाना खा रहे थे और प्रभु यीशु ने कहा, “सच यह है कि तुम में से एक मेरे साथ विश्वास-घात करेगा। तुम में से एक जो अभी यहाँ मेरे साथ खाना खा रहा है।” |
| 19 यीशु के चेले बहुत दुखी हुए। वे एक-एक करके प्रभु से पूछने लगे, “वह मैं नहीं हूँ, है न?” |
| 20 प्रभु ने कहा, “मेरे बारह दूतों, वह तुम में से ही एक है। वह तुम में से एक है जो अपनी रोटी मेरे साथ कटोरे में डूबोता है। |
| 21 सृष्टि के परमेश्वर की पवित्र किताब भविष्यवाणी करती है कि मुझे, आदमी के बेटे को मरना ज़रूरी है। लेकिन मेरे विश्वास-घात करने वाले के लिए यह कितना भयानक होगा। उसके लिए अच्छा होता कि वह पैदा ही न हुआ होता!” |
| 22 वे खाना खा रहे थे और प्रभु यीशु ने रोटी ली। उन्होंने धन्यवाद देकर उसे तोड़ा। फिर प्रभु ने उसे अपने बारह दूतों को दिया और कहा, “इसे लो और खाओ। यह मेरा शरीर है।” |
| 23 इसके बाद प्रभु ने कप लेकर धन्यवाद दिया। फिर उन्होंने अपने बारह दूतों को कप दे दिया। और उन सब ने उसमें से पिया। |
| 24 प्रभु ने कहा, “यह मेरा खून है जो सृष्टि के परमेश्वर और लोगों के बीच में नया वादा है। मैं अपना खून बहुत से लोगों के लिए बहाता हूँ। |
| 25 सच यह है कि मैं फिर से उस दिन तक अंगूर का रस नहीं पियूँगा जब तक परमेश्वर के राज्य में नया न पिऊँ।” |
| 26 उसके बाद उन्होंने सृष्टि के परमेश्वर की प्रशंसा के गीत गाये। फिर वे जैतून पर्वत पर चले गये। |
| प्रभु यीशु का भविष्यवाणी करना कि पतरस उन्हें ठुकरायेगा |
| 27 फिर प्रभु यीशु ने अपने बारह दूतों से कहा, “आज रात तुम सब मुझे ठुकराओगे। सृष्टि के परमेश्वर की पवित्र किताब भविष्यवाणी करती है, ‘चरवाहे को मार दिया जायेगा और भेड़ें बिखर जायेंगी।’ |
| 28 लेकिन मैं मरे हुओं में से वापस आऊँगा। फिर मैं तुमसे पहले गलील जाऊँगा और वहाँ तुमसे मिलूँगा। |
| 29 पतरस ने प्रभु से कहा, “अगर हर कोई तुम्हें ठुकरा देगा तो भी मैं तुम्हारे साथ रहूँगा।” |
| 30 प्रभु ने पतरस से कहा, “सच यह है कि आज रात तुम मुझे तीन बार ठुकराओगे। यह मुर्गे के दो बार बाँग देने से पहले होगा।” |
| 31 लेकिन पतरस लगातार जोश में कहता रहा, “मैं आपको कभी नहीं ठुकराऊँगा! अगर मुझे आपके साथ मरना पड़े तो भी नहीं! और दूसरे दूतों ने भी यही कहा।” |
| प्रभु यीशु का गतसमनी में प्रार्थना करना |
| 32 फिर प्रभु यीशु और उनके बारह दूत गतसमनी नाम की एक जगह पर गये। प्रभु ने उनसे कहा, “जब तक मैं प्रार्थना करता हूँ तुम यहाँ पर बैठो।” |
| 33 प्रभु पतरस याकूब और यूहन्ना को अपने साथ ले गये। प्रभु बहुत ज़्यादा परेशान और बेचैन हो गये। |
| 34 प्रभु ने उनसे कहा, “मेरा प्राण इतना दुखी है कि मैं मरने पर हूँ। यहाँ पर इन्तज़ार करो और सतर्क रहो।” |
| 35 फिर प्रभु थोड़ा आगे गये। उन्होंने ज़मीन पर गिरकर प्रार्थना की कि अगर हो सके तो यह घड़ी उन पर से टल जाये। |
| 36 प्रभु ने प्रार्थना की, “पिता, आपके लिए सब कुछ मुमकिन है। इस दुख के कप को मुझ से हटा दीजिए। लेकिन आपकी इच्छा पूरी हो न कि मेरी।” |
| 37 फिर वे वापस आये और उन्होंने अपने चेलों को सोता हुआ पाया। प्रभु ने पतरस से कहा, “शमौन, क्या तुम सो गये? क्या तुम एक घण्टा सतर्क नहीं रह सके? |
| 38 सतर्क रहो और प्रार्थना करो। तब परीक्षा तुम पर हावी नहीं होगी। आत्मा मज़बूत है। लेकिन शरीर कमज़ोर है।“ |
| 39 एक बार फिर प्रभु ने जाकर वही प्रार्थना की। |
| 40 तब वे अपने चेलों के पास लौटे। और प्रभु ने उन्हें फिर से सोता हुआ पाया। वे अपनी आँखें खुली नहीं रख सके। और वे नहीं जानते थे कि प्रभु से क्या कहें। |
| 41 फिर वे अपने चेलों के पास तीसरी बार वापस गये। प्रभु ने उनसे कहा, “क्या तुम अभी तक सो रहे हो और आराम कर रहे हो? बहुत हो गया! समय आ गया है। देखो! मैं, आदमी का बेटा पापियों के हाथों में पकड़वाया जाता हूँ। |
| 42 उठो! चलो! मेरा विश्वास-घाती नज़दीक है।” |
| प्रभु यीशु का गिरफ़्तार होना |
| 43 जब प्रभु यीशु बोल ही रहे थे तब यहूदा आया। वह बारह दूतों में से एक था। उसके साथ सीपाहियों की भीड़ थी। वे तलवार और लाठी लिए हुए थे। मुख्य पुरोहितों, कानून के शिक्षकों और बुज़ुर्ग लोगों ने उन्हें भेजा था। |
| 44 यहूदा ने उनसे कहा कि वह यह दिखाने के लिए कि किसे गिरफ़्तार करना है एक खास चिन्ह देगा, “जिसे मैं नमस्कार का चुम्बन दूँगा वह यीशु है। उसे गिरफ़्तार करके पहरेदार की देखरेख में ले जाना।” |
| 45 जब वे पहुँचे, यहूदा सीधे प्रभु के पास गया। उसने कहा, “गुरु जी! गुरु जी! फिर यहूदा ने चुम्बन देकर प्रभु को नमस्कार किया।” |
| 46 उसी समय जो यहूदा के साथ आये थे उन्होंने प्रभु यीशु को पकड़कर गिरफ़्तार कर लिया। |
| 47 तब पास में खड़े लोगों में से किसी एक ने अपनी तलवार निकाली। उसने महापुजारी के सेवक पर हमला किया और उसका कान काट दिया। |
| 48 फिर प्रभु ने कहा, “क्या मैं कोई खतरनाक अपराधी हूँ जो तुम मुझे तलवार और लाठियों के साथ गिरफ़्तार करने आते हो? |
| 49 हर रोज़ मैं तुम्हारे साथ था। मैंने तुम्हें सृष्टि के परमेश्वर के मन्दिर में शिक्षा दी। और तुमने मुझे गिरफ़्तार नहीं किया। लेकिन वह सब सच होना है जिसकी सृष्टि के परमेश्वर की पवित्र किताब में भविष्यवाणी की गयी है।” |
| 50 फिर यीशु के सभी चेले उन्हें छोड़कर भाग गये। |
| 51 एक ही जवान था जो प्रभु के पीछे चलता रहा। उसने लिनन के कपड़े के टुकड़े के सिवाय और कुछ नहीं पहना था। भीड़ ने उसे पकड़ने की कोशिश की। |
| 52 लेकिन वह अपना कपड़ा उनके हाथों में छोड़कर नंगा भाग गया। |
| प्रभु यीशु का उच्च नयायालय में ले जाया जाना |
| 53 भीड़ प्रभु यीशु को महापुजारी के पास ले गयी। सभी मुख्य पुजारी, बुज़ुर्ग लोग और कानून के शिक्षक वहाँ इकट्ठा हुए। |
| 54 पतरस ने दूर से प्रभु का पीछा किया। वह सीधे महापुजारी के आंगन में गया। वहाँ उसने नौकरों के साथ बैठकर आग सेंकी। |
| 55 मुख्य पुरोहित और पूरा उच्च न्यायालय जो सेनहेडरिन कहलाता था प्रभु यीशु के खिलाफ़ गवाह ढूँढ़ रहे थे। वे प्रभु को मौत की सज़ा दिलाना चाहते थे। लेकिन उन्हें कोई सबूत नहीं मिला। |
| 56 बहुत से झूठे गवाहों ने प्रभु के खिलाफ़ गवाही दी। लेकिन वे एक दूसरे से सहमत नहीं हुए। |
| 57 अन्त में कुछ लोग खड़े उठे। उन्होंने प्रभु के बारे में झूठी गवाही दी, |
| 58 “हमने यीशु को कहते सुना, ‘मैं आदमी के हाथों द्वारा बनाये गये सृष्टि के परमेश्वर के इस मन्दिर को नाश कर दूँगा। और तीन दिन में मैं एक दूसरा मन्दिर बनाऊँगा जो आदमी के हाथों से बना हुआ नहीं होगा।’” |
| 59 लेकिन फिर भी उनकी गवाही एक सी नहीं थी। |
| 60 फिर महापुजारी सबके सामने खड़ा हुआ। उसने प्रभु यीशु से पूछा, “क्या तुम जवाब नहीं दोगे? जो दोष ये लोग तुम पर लगा रहे हैं वे क्या हैं?” |
| 61 लेकिन प्रभु चुप रहे और कुछ नहीं कहा। फिर से महापुजारी ने उनसे पूछा, “क्या तुम मसीह हो, सारी सृष्टि के राजा? क्या तुम सृष्टि के आशीषित परमेश्वर के बेटे हो?” |
| 62 प्रभु ने कहा, “मैं हूँ। और तुम मुझे, आदमी के बेटे को शक्ति के दाईं ओर बैठे हुए और बादलों पर आते हुए देखोगे।” |
| 63 महापुजारी ने गुस्से में आकर अपने कपड़े फाड़ दिए। उसने कहा, “हमें और गवाहों की क्या ज़रूरत है?” |
| 64 तुमने अभी खुद सुना कि उसने सृष्टि के परमेश्वह के खिलाफ़ कैसे बोला। तुम क्या सोचते हो?” उन सब ने प्रभु को दोषी पाया। और उन्होंने कहा कि प्रभु को मौत की सज़ा मिलनी ही चाहिए। |
| 65 फिर उनमें से कुछ प्रभु पर थूकने लगे। उन्होंने प्रभु का चेहरा ढक दिया और उन्हें मारने लगे। उन्होंने कहा, “भविष्यवाणी कर कि आगे क्या होगा!” और पहरेदारों ने उसे ले जाकर मारा। |
| पतरस का यह कहना कि वह प्रभु यीशु को नहीं जानता |
| 66 इस समय पतसर नीचे आंगन में था। महापुजारी की एक नौकरानी वहाँ आयी। |
| 67 उसने पतरस को आग सेकते हुए देखा। उसने उसे ध्यान से देखकर कहा, “तुम भी नासरी के यीशु के साथ थे।” |
| 68 लेकिन पतरस ने मना किया। उसने कहा, “मैं नहीं जानता, मुझे नहीं पता कि तुम किस बारे में बात कर रही हो।” और वह प्रवेश द्वार की ओर बाहर चला गया। तभी एक मुर्गे ने बाँग दी। |
| 69 नौकरानी ने पतरस को फिर से वहाँ देखा। और वह दूसरों से कहने लगी, “यह आदमी यीशु के चेलों में से एक है।” |
| 70 लेकिन पतरस ने फिर से मना किया। कुछ समय के बाद पतरस के पास खड़े लोग उससे कहने लगे, “तुम ज़रूर यीशु के चेलों में से एक हो। तुम्हारा बोलना भी गलील के लोगों की तरह है।” |
| 71 लेकिन पतरस ने कहा, “मैं परमेश्वर की कसम खाकर कहता हूँ जिस यीशु की तुम बात कर रहे हो मैं उसे नहीं जानता!” |
| 72 उसी समय मुर्गे ने दूसरी बार बाँग दी। अचानक से पतरस को प्रभु यीशु की बात याद आयी, “मुर्गे के दो बार बाँग देने से पहले तुम तीन बार मेरा इनकार करोगे।” और पतरस फूट-फूटकर रोने लगा। |
अध्याय 15 |
| लोगों का प्रभु यीशु को राज्यपाल के पास लाना |
| 1 यह बहुत सुबह की बात थी। मुख्य पुरोहित, बुज़ुर्ग लोग, कानून के शिक्षक और पूरा उच्च न्यायालय फ़ैसला लेने के लिए इकट्ठा हुए। वे प्रभु यीशु को बाँधकर राज्यपाल पिलातुस के पास ले गये। |
| 2 पिलातुस ने पूछा, “क्या तुम यहूदियों के राजा हो?” प्रभु यीशु ने कहा, “तुम ऐसा कहते हो।” |
| 3 फिर मुख्य पुरोहितों ने प्रभु पर बहुत से अपराधों का आरोप लगाया। |
| 4 इसलिए पिलातुस ने उनसे फिर पूछा, “क्या तुम जवाब नहीं दोगे? देखो, तुम्हारे खिलाफ़ कितने आरोप हैं!” |
| 5 लेकिन प्रभु यीशु ने कुछ नहीं कहा। पिलातुस को हैरानी हुई। |
| 6 राज्यपाल के पास हर साल मिस्र की गुलामी से छुटकारे के त्योहार के समय एक कैदी को छोड़ने का रिवाज था। लोग किसी भी एक कैदी को छुड़ा सकते थे। |
| 7 उस समय बरब्बास कैदियों में से एक था। उसने और उसके साथियों ने सरकार के खिलाफ़ लड़ाई की और कत्ल किया। |
| 8 भीड़ ने हमेशा की तरह चिल्लाकर पिलातुस से एक कैदी को छोड़ने के लिए कहा। |
| 9 पिलातुस ने पूछा, “क्या तुम चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिए यहूदियों के राजा को छोड़ दूँ?” |
| 10 पिलातुस जानता था कि मुख्य पुरोहितों ने प्रभु यीशु को जलन के मारे गिरफ़्तार करवाया था। |
| 11 लेकिन मुख्य पुरोहितों ने भीड़ को भड़काया। इसलिए भीड़ ने प्रभु यीशु के बजाय बरब्बास को छोड़ने की माँग की। |
| 12 तब पिलातुस ने फिर से कहा, “तुम इस आदमी को यहूदियों का राजा बुलाते हो! मैं उसके साथ क्या करूँ?” |
| 13 भीड़ चिल्लायी, “उसे क्रूस पर मार दो!” |
| 14 पिलातुस ने उनसे पूछा, “क्यों? उसने क्या अपराध किया है?” लेकिन वे और ज़ोर से चिल्लाये, “उसे क्रूस पर मार दो!” |
| 15 पिलातुस भीड़ को खुश करना चाहता था। इसलिए उसने बरब्बास को उनके लिए छोड़ दिया। फिर पिलातुस ने सिपाहियों को प्रभु को कोड़े मारकर क्रूस पर चढ़ाने की आज्ञा दी। |
| सिपाहियों का प्रभु यीशु का मज़ाक बनाना |
| 16 सिपाही प्रभु यीशु को महल के अन्दर एक जगह पर ले गये। वह प्रीटोरियुम कहलाता था। उन्होंने वहाँ सिपाहियों का एक बड़ा झुण्ड इकट्ठा किया। |
| 17 उन्होंने प्रभु यीशु को राजा की तरह दिखने के लिए बैंगनी रंग के कपड़े पहनाये। फिर उन्होंने ताज बनाने के लिए काँटों को साथ में गुथा। उन्होंने उसे प्रभु यीशु के सिर पर रखा। |
| 18 वे प्रभु का मज़ाक उड़ाने लगे। वे चिल्लाये, “यहूदियों के राजा की जय हो!” |
| 19 उन्होंने प्रभु के सिर पर डण्डे से मारा और उन पर थूका। उन्होंने अपने घुटनों पर बैठकर प्रभु की आराधना करने का ढोंग किया। |
| 20 अन्त में सिपाहियों ने प्रभु का मज़ाक बनाना खत्म किया। उन्होंने बैंगनी कपड़े उतारकर प्रभु के अपने कपड़े फिर से उन्हें पहनाये। फिर वे प्रभु को क्रूस पर चढ़ाने के लिए ले गये। |
| प्रभु यीशु को क्रूस पर चढ़ाना |
| 21 वहाँ शमौन नाम का एक आदमी था जो सिकन्दर और रूफुस का पिता था। वह कुरेनी से था। शमौन प्रभु यीशु और सिपाहियों के पास से गुज़र रहा था। वह यरूशलेम के बाहरी क्षेत्र से आ रहा था। सिपाहियों ने शमौन पर दबाव डाला कि वह उनके साथ यीशु का क्रूस उठाकर चले। |
| 22 अन्त में सिपाही प्रभु यीशु को गुलगुता नाम की जगह पर लाये। गुलगुता शब्द का मतलब है खोपड़ी की जगह। |
| 23 उन्होंने प्रभु को मुर्र मिली हुई वाइन दी। लेकिन प्रभु ने उसे पीने से मना कर दिया। |
| 24 फिर उन्होंने प्रभु को क्रूस पर चढ़ाकर उनके कपड़ों के लिए जुआ खेला। उन्होंने यह तय करने के लिए परचियाँ डालीं कि यीशु के कपड़े कौन लेगा। |
| 25 सुबह के नौ बजे उन्होंने प्रभु को क्रूस पर चढ़ाया। |
| 26 सीपाहियों ने यीशु के सिर के ऊपर एक तख्ती पर सूचना लिखी। यह उनके अपराध की घोषणा कर रही थी, “यहूदियों का राजा।” |
| 27 सीपाहियों ने दो और अपराधियों को भी क्रूस पर चढ़ाया। एक यीशु के दाईं ओर था और दूसरा बाईं ओर। |
| 28 यह वैसे ही हुआ जैसा कि प्रभु का संदेश लाने वाले यशायाह ने सृष्टि के परमेश्वर की पवित्र किताब में भविष्यवाणी की थी, “लोगों ने सारी सृष्टी के राजा के साथ अपराधियों के जैसा व्यवहार किया।” |
| 29 लोग क्रूस के पास से गुज़रे। उन्होंने प्रभु को ज़ोर-ज़ोर से गाली दी। उन्होंने अपने सिर हिलाकर कहा, “अरे! उसे देखो! वह सृष्टि के परमेश्वर के मन्दिर को नाश करके तीन दिन में फिर से बनाने वाला था! |
| 30 खुद को बचा! क्रूस से नीचे उतर आ!” |
| 31 उसी तरह से मुख्य पुरोहितों और कानून के शिक्षकों ने प्रभु यीशु का मज़ाक उड़ाया। उन्होंने एक दूसरे से कहा, “उसने दूसरों को बचाया लेकिन वह खुद को नहीं बचा सकता! |
| 32 अब यह मसीह, इस्राएल का राजा क्रूस से उतरकर दिखाए तब हम विश्वास करेंगे।” यहाँ तक कि वे दो अपराधी जो प्रभु यीशु के साथ क्रूस पर चढ़ाये गये थे उन्होंने भी प्रभु को गाली दी। |
| प्रभु यीशु की मौत |
| 33 दिन के 12 बजे थे। अचानक से पूरी जगह पर अंधेरा छा गया। यह तीन घण्टे तक रहा। |
| 34 तीन बजे प्रभु यीशु ज़ोर से चीखे, “इलोई, इलोई लमा शबक्तनी?” इसका मतलब है “मेरे परमेश्वर, मेरे परमेश्वर, आपने मेरी ओर अपनी पीठ क्यों फेर दी?” |
| 35 कुछ लोग क्रूस के पास खड़े थे। उन्होंने यह सुनकर कहा, “सुनो! वह प्रभु का संदेश लाने वाले एलिय्याह को पुकार रहा है।” |
| 36 उनमें से एक ने दौड़कर खट्टी वाइन में स्पंज को भिगोया। उसने उसे एक डण्डे में रखा। फिर उसने उसे प्रभु को पिलाने के लिए उनकी ओर उठाया। उसने कहा, “ठहरो! देखते हैं कि क्या प्रभु का संदेश लाने वाला एलिय्याह उसे क्रूस से उतारने के लिए आयेगा।” |
| 37 प्रभु यीशु ने ज़ोर की चीख के साथ आखिरी साँस ली। |
| 38 और सृष्टि के परमेश्वर के मन्दिर का पर्दा ऊपर से नीचे की ओर दो हिस्सों में फट गया। |
| 39 प्रभु यीशु के सामने एक रोमी सेनापति खड़ा था। उसने यीशु की चीख सुनी और उन्हें मरते हुए देखा। फिर उसने कहा, “मुझे यकीन हो गया कि यह आदमी परमेश्वर का बेटा था!” |
| 40 वहाँ पर कुछ औरतें थीं। उनमें मरीयम मगदलीनी, सलोमी और छोटे याकूब और योसेस की माँ मरीयम थीं। वे दूर से देख रही थीं। |
| 41 ये औरतें यीशु के पीछे चलती थीं। जब प्रभु यीशु गलील में थे तो उन्होंने प्रभु की सेवा की थी। फिर वे और बहुत सी दूसरी औरतें प्रभु के साथ यरूशलेम आयी थीं। |
| यूसुफ का यीशु के शव को दफ़नाना |
| 42 यह शुक्रवार की शाम थी। शुक्रवार शनिवार की तैयारी का दिन कहलाता था। |
| 43 वहाँ यूसुफ नाम का एक आदमी था। वह अरिमतिया शहर से था। यूसुफ उच्च समिति का मुख्य सदस्य था। वह परमेश्वर के राज्य के आने का इन्तज़ार कर रहा था। यूसुफ ने साहस से राज्यपाल पिलातुस के पास जाकर यीशु का शव माँगा। |
| 44 पिलातुस को यह सुनकर हैरानी हुई कि प्रभु की मौत इतनी जल्दी हो गयी। इसलिए उसने रोमी सेनापति को बुलाकर पूछा, “क्या यीशु मर चुका है?” |
| 45 सेनापति ने कहा कि प्रभु सच में मर चुके हैं। इसलिए पिलातुस ने यीशु का शव यूसुफ को दे दिया। |
| 46 फिर यूसुफ ने कुछ लिनन का कपड़ा खरीदा। उसने यीशु का शव क्रूस से नीचे उतारकर लिनन के कपड़े में लपेटा। उसने शव को एक कब्र में रखा जो चट्टान को काटकर बनायी गयी थी। फिर उसने कब्र का मुँह एक बड़े पत्थर से बन्द कर दिया। |
| 47 मरीयम मगदलीनी और योसेस की माँ, मरीयम ने देखा कि यूसुफ ने यीशु का शव कहाँ रखा। |
अध्याय 16 |
| प्रभु यीशु का फिर से जीवित होना |
| 1 अगली शाम को जब शनिवार खत्म हुआ, मरीयम मगदलीनी, सलोमी और याकूब की माँ, मरीयम सुगंधित तेल लेकर आयीं। उनके दफ़नाने की प्रथा के अनुसार वे उसे यीशु के शव पर लगाने वाले थे। |
| 2 रविवार की सुबह वे कब्र पर आयीं। यह सूर्योदय के ठीक बाद की बात थी। |
| 3 उन्होंने एक दूसरे से पूछा, “कब्र के मुँह से पत्थर कौन हटायेगा?” |
| 4 लेकिन जब वे पहुँचीं तो उन्होंने देखा कि पत्थर पहले से ही हटा हुआ था। पत्थर बहुत बड़ा था। |
| 5 उन्होंने कब्र में प्रवेश किया और एक स्वर्गदूत को देखा। वह दाईं ओर बैठा था। वह सफ़ेद कपड़े पहने हुए एक जवान आदमी की तरह दिखाई देता था। औरतें बहुत डर गयीं। |
| 6 लेकिन स्वर्गदूत ने कहा, “डरो मत! तुम नासरत के प्रभु यीशु को ढूँढ़ रही हो जिन्हें क्रूस पर मारा गया था। लेकिन वे मरे हुओं में से जीवित हो गये हैं। वे यहाँ नहीं हैं। देखो, यह वही जगह है जहाँ पर उनका शव रखा गया था। |
| 7 अभी जाओ और उनके चेलों और पतरस से कहो, ‘प्रभु तुम से पहले गलील जा रहे हैं। तुम उन्हें वहाँ देखोगे जैसे मरने से पहले उन्होंने तुमसे कहा था।’” |
| 8 औरतें बाहर जाकर कब्र से भाग गयीं। वे पूरी तरह से घबरा गयी थीं और डर से काँप रही थीं। उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा क्योंकि वे बहुत डर गयी थीं। |
| 9 प्रभु यीशु रविवार की सुबह-सुबह मरे हुओं में से जीवित हुए। सबसे पहले वे मरियम मगदलीनी को दिखाई दिये। यह वही औरत थी जिसमें से प्रभु ने सात बुरी आत्माओं को निकाला था। |
| 10 मरियम मगदलीनी ने जाकर यीशु के चेलों को ढूँढ़ा। वे दुखी थे और रो रहे थे। |
| 11 मरियम ने चेलों से कहा कि प्रभु यीशु जीवित हैं और उसने प्रभु को देखा है। लेकिन यीशु के चेलों ने उस पर विश्वास नहीं किया। |
| 12 इसके बाद प्रभु अपने दो चेलों को दिखाई दिये। ये दो आदमी यरूशलेम से बाहर पैदल चल रहे थे। लेकिन शुरू में उन्होंने प्रभु को नहीं पहचाना क्योंकि प्रभु ने अपना रूप बदला था। |
| 13 बाद में इन दो आदमियों ने महसूस किया कि जो उन्हें दिखाई दिये वे प्रभु यीशु थे। फिर उन्होंने यरूशलेम वापस आकर दूसरे यीशु के चेलों को इसके बारे में बताया। लेकिन उन्होंने इन दो आदमियों पर विश्वास नहीं किया। |
| 14 अन्त में जब यीशु के ग्यारह दूत खाना खा रहे थे तब प्रभु उन्हें दिखाई दिये। प्रभु ने उनसे सख्ती से बात की क्योंकि उनमें विश्वास नहीं था और उनके दिल कठोर थे। उन्होंने उन लोगों पर विश्वास नहीं किया जिन्होंने प्रभु को मरे हुओं में से फिर से जीवित होने के बाद देखा। |
| 15 फिर प्रभु ने उनसे कहा, “पूरी दुनियाँ में जाओ। हर किसी को मेरे बारे में इस महान खबर का प्रचार करो। |
| 16 जो कोई मुझ पर विश्वास करता है और मेरे नाम से पवित्र स्नान लेता है वह बचाया जायेगा। लेकिन जो कोई मुझ पर विश्वास नहीं करता है उसका न्याय किया जायेगा। |
| 17 जो मुझ पर विश्वास करते हैं उनके साथ ये चिह्न होंगे: वे मेरे नाम से बुरी आत्माओं को निकालेंगे। वे नयी भाषाएं बोलेंगे जिन्हें वे पहले नहीं जानते थे। |
| 18 वे अपने हाथों से सांप पकड़ेंगे। और अगर वे कुछ ज़हरीला भी पियेंगे तो वह उन्हें नुक्सान नहीं पहुँचायेगा। वे अपने हाथ बीमार लोगों पर रखेंगे और वे ठीक हो जाएंगे।” |
| 19 प्रभु यीशु ने अपने चेलों से बोलना खत्म किया। फिर प्रभु स्वर्ग को उठाये गये। वे सृष्टि के परमेश्वर के दाईं ओर बैठे। |
| 20 यीशु के चेलों ने हर जगह जाकर प्रभु यीशु के बारे में प्रचार किया। और प्रभु ने उनके साथ काम किया। चेलों ने जो कुछ कहा प्रभु ने बहुत से चमत्कार के चिह्नों द्वारा उसे साबित किया। |